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अब नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर  जाने को ,
 ना जाने क्यों ?
हालाँकि बदला कुछ खास नहीं है.
सिर्फ माता-पिता का साया उठा है ,
उस घर से , अलावा  सब वैसा ही  तो है,
भाई-भाभी, बच्चे , पडोसी सब.
पर  पता नहीं अब क्यों नहीं ,
लगता मन ,
सोचता हूँ क्या खास था तब ,
दौड़ा चला आता था मैं ,
बेवजह छुट्टियां लेकर ,
अब छुट्टी हो तब भी ,
नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर  जाने को ,
ना जाने क्यों ?

अप्रकाशित -मौलिक

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 9, 2014 at 1:59pm

नवल किशोर जी

आपकी भावनाओं की मैं कद्र करता हूँ  i आपने जो लिखा वह मेरा साथ भी  घटित हुआ  है i आपने बड़े संयम से उचित शब्द सन्योजन से अपनी भावनाओ को बाँधा है तभी यह छोटी रचना प्रभाव डालती है i  कोशिश जारी रहे i सस्नेह i

Comment by Naval Kishor Soni on December 9, 2014 at 11:42am

धन्यवाद सर


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 9, 2014 at 11:33am

आपने मनोभावों को सुन्दर शब्द दिए हैं भाई नवल किशोर जी, बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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