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खुदा को दो नयी मज़ार बनानी थी

छुपा कर दिल में रक्खी थी

बचपन में बनी प्रेम कहानी थी

 

तुम्हारे जिस पर नाम लिखे थे

दीवार वो, बहुत पुरानी थी

 

पगली ,इश्क में तेरे दीवानी थी

तूने फ़ौज मैं जाने की ठानी थी    

 

तुझे सेहरा बाँध के आना था

निकाह की रस्म निभानी थी

 

कुछ अजब तौर की कहानी थी

तेरी लाश तिरगे में आनी थी

 

उठ गए थे खुनी खंज़र

जान तो जानी ही थी

 

अरे आसमां से तो पूछ लेता

खुदा गर तुझे ,बिजली गिरानी थी

 

तू चाहता तो बक्श देता, ए खुदा  

पर तुझे, दो नयी मज़ार बनानी थी !!

 

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 10, 2014 at 10:54am

ग़ज़ल कहने का अच्छा प्रयास है, मंच पर मौजूद ग़ज़ल सम्बन्धी सामग्री को पढ़कर उसका लाभ उठाएं भाई हरि प्रकाश दुबे जी।

Comment by Hari Prakash Dubey on December 3, 2014 at 7:48pm

आदरणीय डॉक्टर गोपाल नारायण जी ,उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से आभार !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 3, 2014 at 7:46pm

आपका हार्दिक धन्यवाद श्री सुशील सरना जी !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 3, 2014 at 7:45pm

सुश्री सीमा जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2014 at 6:52pm

हरि प्रकाश जी

बहुत  बहुत अच्छे  शेर  i

Comment by Sushil Sarna on December 3, 2014 at 4:38pm

अरे आसमां से तो पूछ लेता

खुदा गर तुझे ,बिजली गिरानी थी

 .... वाह मित्र  Hari Prakash Dubey बहुत सुंदर ग़ज़ल।

Comment by seematiwari on December 3, 2014 at 10:56am

बहुत सुन्दर आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 2, 2014 at 11:34pm

आदरणीय मिथिलेश भाई आपका हृदय से आभार !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 2, 2014 at 11:30pm

भावपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति.... बधाई 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 2, 2014 at 11:08pm

बहुत बहुत धन्यवाद् आपका श्री अजय शर्मा जी !

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