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मौत का सघन  साया

अनुभूति बनकर आया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

यह आत्मीयता प्रदर्शन

करुणा  का कलित क्रंदन

चीत्कार आर्त्त रोदन

या नाट्य  अभिनय मंचन

.

इसे देख जी में आया 

छोडूं न अभी काया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

सर्वांग व्यथित परिजन

सूने उदास से मन

इतना असीम कम्पन

तब था न  जब था जीवन

.

यह मोह है या माया

कुछ कुछ समझ में आया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

वक्रोक्ति व्यंग्य दंशन 

हासोपहास लांछन

सहता रहा था जो मन

क्या यही प्रकृत जीवन ?

.

कोई न जान पाया

प्रभु ने मुझे जगाया

मेरे अंतिम  क्षणों में I

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

 

 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 10, 2014 at 6:24pm

जब बोध हो जाता है तो पता लगता है मानव को मै अहम भाव मन में बसा था, और जब तक वह समझ पाता है, अंतिम अवस्था में पहुँच 

जाता है | अंत में अह्सास हो ही गया -

कोई न जान पाया

प्रभु ने मुझे जगाया

मेरे अंतिम  क्षणों में I------वाह ! सुंदर चिंतन परक रचना हुई है | हार्दिक बधाई डॉ गोपाल नारायण जी 

Comment by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 10, 2014 at 6:17pm

इसे देख जी में आया

छोडूं न अभी काया

मेरे अंतिम क्षणों में I

माया मोह में लिपटी महत्‍वाकांक्षाओं का सुंदर चित्रण। सुंदर नवगीत के लिए बधाई। डा- गोपाल नारायण जी। 

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 10, 2014 at 3:25pm
सुन्दर , कुछ छू गया मन और मस्तिष्क को , बहुत बहुत बधाई आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी इस सार गर्भित प्रस्तुति पर .

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