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ग़ज़ल - कभी दोश अश्कों से तर रहा ( गिरिराज भंडारी )

11212     11212      11212       11212  

न तो आँधियाँ ही डरा सकीं , न ही ज़लजलों का वो डर रहा

तेरे नाम का लिये आसरा , सभी मुश्किलों से गुजर रहा

 

न तो एक सा रहा वक़्त ही , न ही एक सी रही क़िस्मतें

कभी कहकहे मिले राह में , कभी दोश अश्कों से तर रहा

 

कोई अर्श पे जिये शान से , कहीं फर्श भी न नसीब हो 

कहीं फूल फूल हैं पाँव में , कोई आग से है गुज़र रहा

 

तेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी , हुआ मौत से जहाँ सामना

हुआ हासिलों का शुमार जब , ये सिफर हुआ वो सिफर रहा

 

कभी था यक़ीन भी छाँव पर , कभी धूप भी थी खिली हुई

हुई बदलियों में वो साजिशें , न वो आफताब न घर रहा

 

ऐ खुदा तेरे तो जहान की , है हक़ीकतें भी अजब गज़ब

कोई खाया इतना कि मर गया, कोई खा सका न तो मर रहा 

 

गिरी बिजलियाँ यहाँ इस क़दर ,जला ख़्वाब का मेरा आशियाँ

बड़ा अब सुकून हुआ मुझे , न वो घर रहा न वो डर रहा

           *******************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

 

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 24, 2014 at 8:27pm

आदरणीय गिरिराज भाई साहब, गुणी जनों से यह सुना है कि मिसरों में एक शब्द भी अधिक न हो अर्थात शेर इस तरह संतुलित हो कि न कुछ जोड़ा जा सके और न घटाया जा सके, मिसरों को एक बार उस कसौटी पर भी देखने की जरुरत है, ख्याल हमेशा की तरह उम्दा है, बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2014 at 6:59pm
" न वो घर रहा न वो डर रहा "
कोई खा खा के मर गया ,
कोइ भूखा ही गुजर गया
कोई फूलों से नाराज़ है
कोई आग से गुजर गया
न ये रहा न वो रहा
यहां जो भी आया चला गया "
बहुत खूबसूरत , आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, बधाई.

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