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स्कूल के कुछ दोस्त मिलकर घर में पड़े पुराने कम्बल गरीबों में बाँटने को निकले। कम्बल बाँट कर वे ज्यों ही वापस चलने को हुए, एक बुजुर्ग ने आवाज़ लगाई ………

"बबुआ जी तनिक सुनो"

"जी बाबा, आपको तो कम्बल दे दिया न ?"

"जी बबुआ जी, कम्बल तो दिया और फिर आप लोग ऐसे ही चल दिए"
"ऐसे ही चल दिए मतलब ?"

"बबुआ जी, पिछले तीन दिन से चमचमाती गाड़ियों में साहब लोग आते हैं, कम्बल बाँट कर फ़ोटो खिचवाते हैं और फिर २०-२० रूपया देकर कम्बल वापस ……… "

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट =>कीमत

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Comment by ram shiromani pathak on December 26, 2013 at 10:16pm

लघुकथा ऐसी जो सोचने पर विवश कर दे ////"देखन को छोटन लगे घाव करे गम्भीर" जय हो   … आदरणीय गणेश जी  हार्दिक बधाई आपको 

Comment by sandhya singh on December 26, 2013 at 12:03pm

बहुत सुन्दर लघु कथा .......अप्रत्याशित अंत ......एक सघन सोच लेखक की 

Comment by Satyanarayan Singh on December 25, 2013 at 8:21pm

आ. बागी जी सादर

       इस रंग बदलती दुनिया का आपने एक और  पहलु समाज के सामने उजागर किया है इस लघु कथा के माध्यम से हार्दिक बधाई आदरणीय.

Comment by MAHIMA SHREE on December 25, 2013 at 8:02pm

ह्म्म्म मम्म ऐसा भी होता ?? ये  मुझे पता नहीं था ... कई  ढोंग  और धोखे गरीबो के साथ होते हैं पर .. ये तो बहुत बड़ा  और घिनोना मजाक है  ... बधाई आदरणीय बागी जी .. लघु कथा के बहाने  सेवा पे  नाम पर ऐसी घटनाओं  को उद्घाटित करने के लिए .. सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 25, 2013 at 3:21pm

आदरणीय भ्राताश्री वाह बहुत ही सटीक और कडवी सच्चाई बयां की है आपने दिल खुश हो गया पढ़कर बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by Shubhranshu Pandey on December 25, 2013 at 3:06pm

आदरणीय गणेश भैया,

कई देसी- विदेशी तथाकथित सेवा संस्थानों के क्रियाकलाप का भेद आपने खोल दिया है. गरीबों की सेवा करने और फ़िर उस संस्थान के  एक पोस्ट के लिये चुने जाने के लिये लाखों खर्च करने वालों की हकीकत है.

सुन्दर कथा है.

सादर. 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 25, 2013 at 8:45am

आज के समय में यही सब हो रहा है, क्या पता भविष्य में इन्सान के और कितने रूप देखने को मिलते है, शायद २० रु भी न दें एवम  तस्वीरे भी निकल जाये ,वर्तमान के कटु सत्य को बयां करती लघुकथा हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय गणेश जी   :-))

Comment by vandana on December 25, 2013 at 6:54am

ओह !!! कडवी सच्चाई बयां करती लघुकथा ....सटीक प्रहार ! आदरणीय गणेश जी 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 24, 2013 at 10:52pm

सस्ते में नाम ( और पुण्य ) कमाने की इस नई तरकीब का सफल प्रयोग सचमुच ही कुछ लोग करते होंगे और कुछ प्रारम्भ कर देंगे॥

सच्चाई के करीब इस लघु कथा की हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश भाई॥

Comment by upasna siag on December 24, 2013 at 10:40pm

इस दिखावटी दुनिया में सब सम्भव है। 

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