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इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम / ग़ज़ल "संदीप पटेल "दीप"

रस्म वाले देश की औलाद हैं हम
आज के बच्चे कहें सैयाद हैं हम

उनकी बीबी मायके जब से गयी है  
कहते फिरते आजकल आज़ाद हैं हम

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम

"दीप" हरदम की मदद है दूसरों की
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by अरुन 'अनन्त' on December 2, 2013 at 2:51pm

आदरणीय संदीप भाईसाहब कमाल के अशआर कहे हैं आपने बेहद शानदार ग़ज़ल हुई ढेरों दिली दाद कुबूल फरमाएं.

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम .... वाह वाह वाह

छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम .. बहुत ही उम्दा

इन दो अशआरों हेतु विशेषतौर से दाद हाजिर है भाई जी

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 12:06pm

जय हो आदरणीय, आपकी सदा जय हो ।

उनकी बीबी मायके जब से गयी है  
कहते फिरते आजकल आज़ाद हैं हम

वाह-वाह, दिल की बात कह  दी आपने, अकेला आदमी शेर ही तो होता है, सादर

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