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सैलाब ..... विजय निकोर

सैलाब

 

अश्कों के बहते सैलाब से जूझते

जब-जब उस आख़री खत को पढ़ा

बेचैन दुखती आँख से मेरी , हर बार

काँपता आँसू वह तुम्हारा था टपका ...

 

कहती थी, खुदा से बात की है तुमने

सुख-दुख हमेशा साझा रहेगा हमारा

अच्छा था फ़ैसला यह तुम्हारे खुदा का

खुश हूँ, तुम्हारा दुख तो अब मेरा रहेगा।

 

कितनी बातें थीं बाकी अभी तो करने को

सिर्फ़ मौसम पर बातें करने के अलावा

दुहरा दिया क्यूँ यादों ने वह किस्सा पुराना

झोंकों में और भी तो नगमे थे इसके सिवा।

 

आखरी उदास शाम उदास न होती तो क्या होती

क्या हुआ आज जो तुम्हारी हर याद से रोना आया

तुम थी तो आते थे मौसम पर मौसम कितने, अब

बस सिसकता सावन, कोई मौसम नया नहीं आया।

 

भीग गए हैं इस सैलाब में उस खत के सारे पन्ने

पर दिल पर लिखे खत का लफ़ज़ एक नहीं बिखरा

अच्छा है टपकते रहे हैं मेरी आँखों से आँसू तुम्हारे

बिना आँचल तुम्हारे, इन आँखों से सैलाब निखरा।

-------

-- विजय निकोर

 (मौलिक व अप्रकाशित)

 

 

Views: 815

Comment

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Comment by vijay nikore on November 28, 2013 at 8:22am

 

//वियोग को बहुत गहन अभिव्यक्ति मिली है//... रचना के मर्म को छूने के लिए और सराहना के लिए

आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई सौरभ जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on November 28, 2013 at 8:18am

आदरणीया गीतिका जी, आपने रचना को मान दिया, मैं आपका आभारी हूँ।

 

सधन्यवाद,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on November 28, 2013 at 8:16am

आदरणीय भाई संदीप जी, रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Priyanka singh on November 25, 2013 at 9:22pm

भीग गए हैं इस सैलाब में उस खत के सारे पन्ने

पर दिल पर लिखे खत का लफ़ज़ एक नहीं बिखरा

अच्छा है टपकते रहे हैं मेरी आँखों से आँसू तुम्हारे

बिना आँचल तुम्हारे, इन आँखों से सैलाब निखरा।

बहुत बहुत खूब.....लाजवाब बहुत ही खूब......बधाई सर...... 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 21, 2013 at 9:07am

अति सुंदर भाव, अथाह गहराई ली हुई रचना पर बधाई स्वीकारें आदरणीय विजय जी

Comment by Vindu Babu on November 21, 2013 at 6:09am

प्रेम का नित्य साथी वियोग....इसी रस में पगी हुई सुन्दर रचना के लिए सादर बधाई आपको आदरणीय।

रचना को देखते ही लगा, लगता है इस बार अपने अभिव्यक्ति को किसी छंद विधान में बांध दिया पर वास्तव में 'छंद मुक्त', आपके  उत्कृष्ट मुक्त भावेश का परिचायक है।

बहुत सुन्दर।

शुभ शुभ

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 20, 2013 at 9:42pm

हर बार की तरह ये प्रस्तुति भी मन को भिगो गई आपकी रचनाएं जैसे गहन खारे सागर से निकल कर आती हैं ,बधाई आपको सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 20, 2013 at 6:58pm

अच्छा है टपकते रहे हैं मेरी आँखों से आँसू तुम्हारे

बिना आँचल तुम्हारे, इन आँखों से सैलाब निखरा।---वाह ! आदरणीय निकोरे जी, क्या खूब लिखा है, अति संवेदनशील 

                                                                               और प्रेम वियोग में भिगोई कलम से | बहुत खूब बधाई 

Comment by MAHIMA SHREE on November 19, 2013 at 11:13pm

आदरणीय विजय सर ... आपकी सभी रचनाएं भावनात्मक तो होती ही है और मन के भीतर तक छु जाती हैं ... ये प्रस्तुती भी उसी कोमलता से प्रस्तुत हुयी है ... बधाई स्वीकार करें

Comment by ram shiromani pathak on November 19, 2013 at 11:00pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति  आदरणीय विजय निकोर  जी बधाई  आपको///सादर 

कृपया ध्यान दे...

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