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मिलने पर नजरें चुराओगे था मालूम मुझे

यूं मुझे भूल न पाओगे था मालूम मुझे

दिल में लोबान जलाओगे था मालूम मुझे

अपने अश्कों से भिगो बैठोगे मेरा दामन 

एक दिन मुझको रुलाओगे था मालूम मुझे

 

मैंने सीने से लगा रक्खा है तेरा हर ख़त

ख़त मगर मेरा जलाओगे था मालूम मुझे 

 

यूं तो वादा भी किया, तुमने कसम भी खाई.

गैर का घर ही बसाओगे था मालूम मुझे

सारे इलज़ाम ले बैठा तो हूँ मैं अपने सर

मिलने पर नजरें चुराओगे था मालूम मुझे 

डॉ आशुतोष मिश्र 

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 698

Comment

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Comment by वेदिका on October 7, 2013 at 1:59am

क्या खूब गज़ल कही है आपने आ0 आशुतोष जी!!

Comment by रमेश कुमार चौहान on October 2, 2013 at 7:30pm

सारे इलज़ाम ले बैठा तो हूँ मैं अपने सर

मिलने पर नजरें चुराओगे था मालूम मुझे.............

प्यार की पराकष्ठा को व्यक्त करता बहुत ही सुंदर............. बधाई


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 2, 2013 at 5:10pm

लम्बी रदीफ़ के साथ अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई डॉ आशुतोष मिश्रा जी । 

Comment by बृजेश नीरज on October 2, 2013 at 7:01am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by vijay nikore on October 2, 2013 at 5:01am

इस उम्दा गज़ल के लिए बधाई

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 1, 2013 at 11:10pm

आदरणीय वाह बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल क्या कहने बहुत बहुत बधाई स्वीकारें

Comment by D P Mathur on October 1, 2013 at 9:42pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी, प्यार भरा उलाहना लिए हुए हर दिल पसंद सुन्दर गजल के लिए आपको अनेकों बधाईयां ।

Comment by ram shiromani pathak on October 1, 2013 at 8:38pm

वाह वाह क्या कहने आदरणीय आशुतोष सर,बहुत सुन्दर गज़ल//हार्दिक बधाई आपको  !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 1, 2013 at 8:02pm

आदरणीय आशुतोष भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाई !!

अपने अश्कों से भिगो बैठोगे मेरा दामन 

एक दिन मुझको रुलाओगे था मालूम मुझे ------------ वाह वा !!!!!

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 1, 2013 at 7:38pm

बहुत ही सुंदर गजल ! मुझे बहुत सान्तावना मिली पढ़कर ! हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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