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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बदलियों से चाँदनी का झिलमिलाना शेष है।
घन तिमिर में दीपकों का बुदबुदाना शेष है॥
सावनों की खो चुकी झड़ियाँ कहीं मिल जाएँगी,
देवदारों की कतारों का सजाना शेष है।
फिर घृणा उन्मादिनी सी दौड़ती है प्राण में,
प्रीत के आखर अढ़ाई कसमसाना शेष है।
हलचलों में खो चली है रात की नि:शब्दता,
भोर की पहली किरण का खिलखिलाना शेष है।
रूढ़ियों के बाँध सारे तोड़ कर कविता बहे,
पीर की प्राचीर में यूँ छटपटाना शेष है।
फिर परिन्दों ने बदल दी आज उड़ने की अदा,
हाय! लेकिन तितलियों का तिलमिलाना शेष है।
बैरियों की घात से,आघात से अवगत हुए,
यार की मीठी छुरी से घर बचाना शेष है।
गाल गीले भी हुए,रतनार भी,गुलनार भी,
चोट खा अन्याय की बस तमतमाना शेष है।
फिर नए दीवार,दर,छज्जे उठाए जाएँगे,
इन पुराने गुम्बदों का चरमराना शेष है।
आह, कितना आस्था की आरती का शोर है,
देवता सा मौन हो कर मुस्कुराना शेष है।
अंतरालों में,सवालों में घुटी है जिंदगी,
पाखियों सा वादियों में गीत गाना शेष है।
सब अदाएँ,भंगिमाएँ हैं बनावट की 'रवी',
चूर मन की मस्तियों में लड़खड़ाना शेष है॥

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment by Parveen Malik on September 12, 2013 at 10:06pm
बेहद खूबसूरत ...
Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 12, 2013 at 5:08pm

दिल की सितार के सभी तार छेड़ दिए , अब आपकी गजल पे मेरा मुस्कुराना शेष है , दिल से मेरी तरफ से आपको बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 12, 2013 at 4:13pm

भाई रविप्रकाश जी आपने काफिया "आना" लिया है जबकि आपने मतले में "झिलमिलाना" और "जलाना" जैसे शब्द लिये है इस तरीके से हर्फ़े कवाफी "लाना" होगा और इस गज़ल के बकिया अशआर में इसे निभाना लाजिम है,

सादर,

Comment by Ravi Prakash on September 12, 2013 at 2:16pm
धन्यवाद ! कृपया मुझे जरा खुल कर समझाएँ वीनस जी।
Comment by Ravi Prakash on September 12, 2013 at 2:15pm
धन्यवाद ! कृपया मुझे जरा खुल कर समझाएँ वीनस जी।
Comment by वीनस केसरी on September 12, 2013 at 1:24pm

फिर परिन्दों ने बदल दी आज उड़ने की अदा,
हाय! लेकिन तितलियों का तिलमिलाना शेष है।

बैरियों की घात से,आघात से अवगत हुए,
यार की मीठी छुरी से घर बचाना शेष है।

वाह वा ...

ग़ज़ल ने झूमा ही दिया

अच्छी ग़ज़ल हुई है मगर मतले में काफियाबंदी और उसकी बंदिश पर गौर फरमाएँ ...
शुभकामनाएं

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 12, 2013 at 11:59am

रवि भाई , बधाई ।

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 12, 2013 at 11:12am

अहा अहा अहा वाह रवि भाई वाह पढ़ते पढ़ते एकाएक वाह बाहर आ गया क्या कहने अत्यंत सुन्दर अप्रितम मनोहारी ग़ज़ल बेहद सुन्दर शब्द संयोजन गहन भाव शानदार उम्दा ग़ज़ल. हृदयतल से ढेरों बधाई स्वीकारें.

प्रीत के आखर अढ़ाई कसमसाना शेष है।.. भाई यह पंक्ति दुबारा देख लें.

Comment by Ravi Prakash on September 12, 2013 at 11:08am
शुक्रिया !!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 12, 2013 at 10:33am
वाह वाह !! आदरणीय रवि प्रकाश जी , लाजवाब गज़ल कही !! हर शेर एक से बढ़ कर एक !! बधाई !!

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