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पहचान

 

                     

हटा कर धूल जब देखा अतीत के  आईने ने हमको,

उसने भी न पहचाना और अनजान-सा देखा हमको,

सालों बाद हमसे पूछे बहुत सवाल पर सवाल उसने,

हर सवाल के जवाब में हमने नाम तुम्हारा था दिया।

                      

ऐसा रहा तस्सवुर तुम्हारा इस सूनी ज़िन्दगी पर मेरी,

नींद आए  तो  देखे  यह  हर  धुँधले  ख़वाब  में  तुमको,

न  आए  नींद तो अँधेरे में यह  अंधे  की टूटी लकड़ी-सी,

ढूँढती है यूँ .. यहाँ, वहाँ, हर मोड़, हर चौराहे पर तुमको।

 

पूछे जो आईना तुमसे तो तुम भी कह देना झूठ उससे,

वह भूल थी तुम्हारी कि हाँ तुमने कभी चाहा था हमको,

वरना ज़िन्द्गी की इन वीरान-सुनसान-तंग गलियों में

इश्क के दर्द से तुम्हारी भी तो कभी कोई पहचान न थी।

   

--------                                                                                                                                                                                           

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on August 21, 2013 at 6:41am

आदरणीय सुलभ जी:

रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार।

सादर,

वि्जय निकोर

Comment by ram shiromani pathak on August 20, 2013 at 2:47pm

आदरणीय विजय निकोर जी,बहुत सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!

Comment by vijay nikore on August 20, 2013 at 1:52pm

आदरणीय रविकर जी:

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on August 20, 2013 at 11:40am

आदरणीय गिरिराज जी:

कविता की सराहना के लिए आपका आभार शत-शत।

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on August 20, 2013 at 11:34am

आदरणीय केवल प्रसाद जी:

आपके उत्साह वर्धन से ्यह रचना सार्थकता को
प्राप्त हुई।
आपका हार्दिक धन्यवाद।

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on August 20, 2013 at 11:30am

आदरणीया अन्नपूर्णा जी:

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on August 20, 2013 at 11:26am

आपकी प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक और प्रेरक है मेरे लिए।

हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अरून जी।

सादर,

विजय निकोर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 19, 2013 at 9:37pm

आदरणीय विजय निकोर जी , सुंदर रचना प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 7:51pm

मन में गहरे तक बसे भाव बिना किसी बनावट के अभिव्यक्त हुए हैं 

शुभकामनाएँ आ० विजय जी 

सादर 

Comment by विजय मिश्र on August 19, 2013 at 5:13pm
विजयजी ,भावनाएँ भी कभी-कभी कितने गहरे गोते खिलाती है ! बहुत ही गमगीन मुद्रा है इसकी . आपकी और कविताओं की तरह इसे पढकर चहक नही पाया ,उल्टा सोचने लगा .अपने ढंग की इस अनूठी कविता के लिए अक्षुण्ण शुभकामना .

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