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मौन शब्द
 
कहे और अनकहे के बीच बिछे
अवशेष  कुछ  शब्द  हैं  केवल,
शब्द भी जैसे हैं नहीं,
ओस-से टपकते शब्द
दिन चढ़ते ही प्रतिदिन
वाष्प बन उढ़ जाते हैं
और मैं सोचता हूँ ... मैं
आज क्या कहूँगा तुमसे ?
 
अनगिनत  भाव-शून्य  शब्द                                               
इस अनमोल रिश्ते   की  धरोहर,                                                                                            
व्याकुल प्रश्न, अर्थ भी व्याकुल
मिथ्या शब्दों की मिथ्या अभिव्यक्ति,
एक ही पुराने रिश्ते से रिसता
रोज़- रोज़ का एक और नया दर्द ...
बहता नहीं है , बर्फ़-सा
जमा रह जाता है।
 
फिर भी कुछ और मासूम शब्द
जाने किस तलाश में चले आते हैं,
उन  शब्दों  के  भावों से शराबोर 
मैं वर्तमान  को  भूल  जाता  हूँ ।
तुम्हारी उपस्थिति में हर बार
यह शब्द  नि:शब्द हो जाते हैं
और मैं कुछ भी कह नहीं पाता,
शब्द उदास लौट आते हैं।
 
तुम्हारी आकृति यूँ ही ख़्यालों में
हर  बार,  ठहर कर, खो  जाती  है,
और मैं  भावहीन  मूक  खड़ा
अपने शब्दों की संज्ञा में उलझा
ठिठुरता रह जाता हूँ ।
यह मौन शब्द
असंख्य  असंगतियों  से   घिरे
मुझको संभ्रमित छोड़ जाते हैं।
 
इन उदासीन, असमर्थ, व्याकुल
शब्दों की व्यथा
भीतर  उतर आती है,
सिमट  रहा  कुछ  और  अँधेरा
बाकी रात  में  घुल  जाता  है,
और उसमें तुम्हारी आकृति की
एक और असाध्य खोज में
यह शब्द  छटपटाते  हैं ... 
तुमसे  कुछ  कहने  को,  वह 
जो मैं आज तक कह न सका।
 
हाँ, तुमसे कुछ सुनने की
कुछ कहने की  जिज्ञासा
अभी  भी  उसी  पुल  पर
हर रोज़ इंतजार करती है।
             ---------
 
 -- विजय निकोर
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on January 30, 2014 at 1:25pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय लक्ष्मण भाई जी।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 25, 2014 at 6:25pm

मौन शब्द भले ही अनकहे रहे पर वे अधिक मुखरित होते है और इस बात की गवाह है आप ही की यह मनु शब्द रचना 

आदरणीय विजय निकोरे जी | मौन शब्दों में छिपी वेदना को पढ़ना और उसका अहसास करने की जिज्ञासा जितनी तीव्र 

होती है उतनी तीव्रता लिखे पड़े शब्दों में नहीं हो सकती | सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारे 

Comment by vijay nikore on January 24, 2014 at 12:44pm

आदरणीय योगराज भाई , 

 

आपका स्नेहसिक्त आशीर्वाद और मनोहारी भावाभिव्यक्ति

दोनो मेरा उत्साहवर्धन करते हैं। हार्दिक आभार स्वीकार करें।

 

सादर,

विजय निकोर


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 15, 2014 at 2:50pm

कहते हैं कि मौन शब्द सबसे अधिक चीत्कार करने मे सक्षम हुआ करते हैं. आपकी कविता भी इसी ओर इंगित करती है. जिस संवेदनशीलता से भावों को में पिरोया गया है उससे रचना निखर कर सामने आई है जिसे पढ़ते हुए आनद प्राप्त हुआ. इस सारगर्भित कविता पर आपको दिल से बधाई। 

Comment by vijay nikore on August 16, 2013 at 7:04am

आदरणीय अदित्य जी:

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

सादर,

विजय निकोर

Comment by Aditya Kumar on August 10, 2013 at 3:52pm

बहुत ही सुन्दर रचना! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by vijay nikore on August 8, 2013 at 10:48am

आदरणीया विनीता जी:

 

//बेहद भावप्रणव और संवेदनशील रचना. अभिव्यक्ति का सौन्दर्य, देखते ही बनता है.//

 

सराहना के इन अमूल्य शब्दों से इस रचना को आपका आशीर्वाद मिला,

मन आल्हादित हुआ। आपका हार्दिक धन्यवाद।

 

सादर,

विजय निकोर

 

 

 

Comment by Vinita Shukla on August 8, 2013 at 10:35am
'तुम्हारी उपस्थिति में हर बार
यह शब्द  नि:शब्द हो जाते हैं
और मैं कुछ भी कह नहीं पाता,
शब्द उदास लौट आते हैं।' बेहद भावप्रणव और संवेदनशील रचना. अभिव्यक्ति का सौन्दर्य, देखते ही बनता है. बधाई स्वीकारें आदरणीय.
 
Comment by vijay nikore on August 8, 2013 at 7:34am

आदरणीय अमन भाई:

 

//दिल की बात कलम तक ले आते है आप , 

भावनाओ के शाब्दिक करण आपकी कला है .....//
यह कह कर आपने मुझको जो मान दिया है, उसके लिए तहेदिल से आभार।
 
सादर,
विजय निकोर
Comment by vijay nikore on August 8, 2013 at 7:32am

आदरणीया वसुंधरा जी:

 

// शब्द नही लौट सकते कभी उदास..उन्हें उन तक पहुचना ही  होता है //

 

रचना को सारगर्भित संज्ञा देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीया |

सादर,

विजय निकोर

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