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चुप तो बैठे हैं हम मुरव्वत में - वीनस

एक ताज़ा ग़ज़ल ...

चुप तो बैठे हैं हम मुरव्वत में

जाएगी जान क्या शराफत में

 

किसको मालूम था कि ये होगा

खाएँगे चोट यूँ मुहब्बत में

 

पीटते हैं हम अपनी छाती क्यों
क्यों पड़े हैं हम उनकी आदत में

 

खून उगलूँ तो उनको चैन आए

आप पड़िए तो पड़िए हैरत में

 

बेहया हैं, सो साँसें लेते हैं

मर ही जाते तुम ऐसी सूरत में

 

अब नहीं आ रहा उधर से जवाब
लुत्फ़ अब आएगा शिकायत में

नाम उन तक पहुँच गया मेरा

अब तो रक्खा ही क्या है शुहरत में


ख़ाब में भी न सोच सकते थे

लिख के भेजा है उसने जो खत में


मैंने रोका था, ख़ाक माने आप

और पड़िए हमारी सुहबत में

जेह्न से वो नहीं उतरता है

हर घड़ी अब रहूँ इबादत में


ठोकरें खाऊंगा ... बहुत अच्छा !

और क्या क्या लिखा है किस्मत में ?



फाइलातुन मफ़ाइलुन फैलुन 
मौलिक व अप्रकाशित
- वीनस

Views: 1488

Comment

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Comment by वीनस केसरी on July 4, 2013 at 12:06pm

सुशील ठाकुर साहब बहुत शुक्रगुजार हूँ 

तेवर मेरा है जमीन जांन एलिया की और लहजा में भी मैंने उनको निभाने के कोशिश की है ..
आपने उनकी इस जमीन पर ग़ज़ल तो पढ़ी होगी ...

Comment by वीनस केसरी on July 4, 2013 at 12:04pm

अतेन्द्र भाई अगर बता दिया कि क्या लिखा था फिर तगज्ज़ुल का क्या होगा ... हा हा हा 

शुक्रगुजार हूँ भाई 

Comment by वीनस केसरी on July 4, 2013 at 12:03pm

डी पी माथुर साहब बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by वीनस केसरी on July 4, 2013 at 12:02pm

वंदना जी आपका आभारी हूँ 

Comment by वीनस केसरी on July 4, 2013 at 12:02pm

धन्वयाद अभिनव अरुण जी ...

Comment by Sushil Thakur on July 4, 2013 at 10:46am
बहर वज्न के हिसाब से ठीक है ग़ज़ल . फ़साहत की कमी . एक औसत दर्जे की रचना . फिर भी आपकी कोशिश को सलाम और बधाइयाँ  . 

--

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on July 4, 2013 at 9:39am

ख़ाब में भी न सोच सकते थे

लिख के भेजा है उसने जो खत में

क्या लिखा था वीनस भाई ख़त में ........वैसे  बहुत अच्छी ग़ज़ल
बधाई !

Comment by D P Mathur on July 4, 2013 at 7:33am

बहुत अच्छी गजल ,बधाई !

Comment by vandana on July 4, 2013 at 7:20am

नाम उन तक पहुँच गया मेरा

अब तो रक्खा ही क्या है शुहरत में 

बहुत अच्छी ग़ज़ल 

Comment by Abhinav Arun on July 4, 2013 at 5:45am
मधुर मनोहर उम्मीद जगाती ,सुंदर भावपूर्ण ग़ज़ल !

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