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वक्त जो हम पर भारी है - वीनस

छोटी बहर पर ग़ज़ल का एक प्रयास  .....

वक्त जो हम पर भारी है 
अपनी भी तय्यारी है 

पूरा कारोबारी है 
ये अमला सरकारी है 

.

प्रजातंत्र के ढांचे में 

हर कोई दरबारी है 

तय्यारी है हमलों की 

अम्न का नाटक ज़ारी है 

सच को कैसे सच कह दें  
जान हमें भी प्यारी है 


खुद को खतरा है खुद से 

ये कैसी खुद्दारी है 

साम्यवाद के नारों पर 

भारी जिम्मेदारी है 



वीनस केसरी 
मौलिक व अप्रकाशित 

फैलुन फैलुन फैलुन फ़ा 

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Comment by वीनस केसरी on June 24, 2013 at 1:24am
Comment by वीनस केसरी on June 24, 2013 at 1:23am
Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on June 23, 2013 at 6:22pm

वीनस जी, बहुत ही सुन्दर भाव| मज़ा आया पढ़ कर| "सच को कैसे सच कह दें - जान हमें भी प्यारी है"... फिर भी सच यह है कि भावों को एक कवि से बेहतर कोई नहीं समझ सकता| बधाई आपको|

Comment by mrs manjari pandey on June 23, 2013 at 4:40pm

       आदरणीय वीनस जी ,बखूबी सामायिक सोच को  चन्द  पंक्तियों  में बयाँ  किया है 

Comment by वीनस केसरी on June 22, 2013 at 11:42pm

धन्यवाद श्याम नारायण वर्मा जी .....

Comment by वीनस केसरी on June 22, 2013 at 11:41pm

जी ... बृजेश जी फिर तो मैंने सही ही समझा था ....

:)))))))))))))))))

Comment by वीनस केसरी on June 22, 2013 at 11:41pm

महिमा श्री जी रचना के अनुमोदन के लिए आपका आभारी हूँ

Comment by Shyam Narain Verma on June 22, 2013 at 12:59pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by बृजेश नीरज on June 22, 2013 at 8:40am

वीनस भाई मैंने तारीफ ही की है। :))))))))

Comment by MAHIMA SHREE on June 22, 2013 at 12:28am

प्रजातंत्र के ढांचे में 

हर कोई दरबारी है...

 

साम्यवाद के नारों पर 

भारी जिम्मेदारी है

 

वाह !!!! बहुत-२ ही करारा कटाछ करती गजल ..सब शेर अपने आप में जबरदस्त हैं .. घाव करें गंभीर वाली बात ... बहुत-२ बधाई आपको आदरणीय वीनस जी

कृपया ध्यान दे...

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