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किस काबिल किया - ग़ज़ल

मालिक ने इस दौड़ में यूं ही नहीं शामिल किया,

फ़क्त ये जानना ज़रूरी है कि किस काबिल किया |

 

कहते रहे जो ज़िंदगी भर खुदा ही आख़िरी ज़रुरत है,

उन्होंने अपनी रूह तक को भी ना हासिल किया |

 

बहुत कोशिशें की मगर पढ़ ना सके उस इबारत को,

जिन हर्फों ने राम और रहमान को फ़ाज़िल किया|

 

सोचा वो धुँआ थी, बिखर के मिल गयी हवाओं में

हर अधूरी ख्वाहिश को इस तरहा मुकम्मिल किया|

 

मैं ना ग़ालिब था, ना मीर ना ही और कोई शायर

कैसे अश्क बहाता मैं, उसने मुझे संगदिल किया|

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on June 12, 2013 at 10:12pm

आपके प्रयास पर आपको बधाई! 

Comment by विजय मिश्र on June 12, 2013 at 6:04pm

सचमुच आज का आदमी अपनी आत्मा और अंतरमन के स्वर सुनने में भी असमर्थ एक पथराया हुआ जीव है . चंद्रेश जी ,बहुत ही सुन्दर भाव उकेरे हैं आपने . बधाई .

Comment by Roshni Dhir on June 12, 2013 at 12:09pm

चंद्रेश कुमार जी 

कहते रहे जो ज़िंदगी भर खुदा ही आख़िरी ज़रुरत है,

उन्होंने अपनी रूह तक को भी ना हासिल किया |..

बहुत सुंदर गज़ल ... हर पंक्ति सुंदर 

आभार 

Comment by Shyam Narain Verma on June 11, 2013 at 5:03pm

सुदर अभिव्यक्ति............................

Comment by वीनस केसरी on June 11, 2013 at 3:39pm

bhai ji ghazal bhi kahte hain khud ko shair bhi nahi mante ... aapki yah adaa bhaa gai :))))))))))

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on June 11, 2013 at 8:43am

जीतेन्द्र जी, आपकी दाद के लिए तहे दिल से धन्यवाद | 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 11, 2013 at 3:14am
आदरणीय..चंद्रेश जी, वाह वाह क्या खूबसूरत गजल पेश की है, दाद कुबूल कीजीऐ..."सोचा वो धुंआ थी, बिखर के मिल गयी हवाओं मे ..हर अधूरी ख्वाहिश को इस तरहा मुकम्मिल किया! मै ना गालिब था, ना मीर ना ही कोई शायर, कैसे अश्क बहाता मैं, उसने मुझे संगदिल किया!

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