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दोस्तों इस मंच पर अपनी पहली रचना पोस्ट कर रहा हूँ........

गिन रहे हैं जिस तरह से आती-जाती सांस को हम......

उस तरह तुमने कभी क्या अपनी साँसों को गिना है ?

सीप की मानिंद दृढ़ है माना ये चेहरा हमारा.....

कोई पूछे इस हृदय से जिसका एक मोती छिना है.......

मैं तुम्हारे संग बीते कुछ पलों को जी रहा हूँ......

सत्य ये है तुम बिना जीवित कहाँ अजी रहा हूँ....

देखते ही देखते "कल" हो गया है "आज" सारा....

किन्तु मैं निष्प्राण सा बस अब तलक माज़ी रहा हूँ......

मेरे सारे क़हक़हों का है बही सारे जहां पर ......

किन्तु दुख तो अनकहा है अनसुना है अनगिना है...

कोई पूछे इस हृदय से जिसका एक मोती छिना है.......

अब भी जां  देता है कोई क्या तुम्हारी हूक पर.....??

वार देता है स्वयं की भूख तेरी भूख पर.....

अब भी कोई है जो देकर तुझको साफ कुर्सियां......

बैठ जाता है स्वयं मिट्टी लगे सन्दूक पर.......

कुर्सियां सब मेरे घर की वर्षों से खामोश है.......

कितना उदास मिट्टी लगा सन्दूक सच तेरे बिना है......

कोई पूछे इस हृदय से जिसका एक मोती छिना है.......

KAVI DEEPENDRA

{अप्रकाशित.....मौलिक.....}

 

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Comment by KAVI DEEPENDRA on May 6, 2013 at 7:48am

बृजेश भाई बहुत आभार.....

Comment by बृजेश नीरज on May 5, 2013 at 11:11pm

बहुत सुन्दर रचना। आपको ढेरों बधाई। 

Comment by KAVI DEEPENDRA on May 5, 2013 at 3:57pm

अशोक भाई बहुत आभार.....

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 5, 2013 at 3:22pm

अब भी जां  देता है कोई क्या तुम्हारी हूक पर.....??

वार देता है स्वयं की भूख तेरी भूख पर.....

अब भी कोई है जो देकर तुझको साफ कुर्सियां......

बैठ जाता है स्वयं मिट्टी लगे सन्दूक पर....... ओहो हो हो वाह! गजब है.दिल खुश कर दिया भाई कवि श्री दीपेन्द्र जी  आपको प्रथम बार पढ़ना बहुत सुन्दर लगा, यूँ ही सुन्दर रचनाएं करते रहें. स्वागत है आपका इस मंच पर. बहुत बहुत बधाई.

Comment by KAVI DEEPENDRA on May 4, 2013 at 7:39pm

प्रियंका जी आपका आभार.....

Comment by Priyanka singh on May 4, 2013 at 7:36pm

कोई पूछे इस हृदय से जिसका एक मोती छिना है.. सुन्दर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 4, 2013 at 7:20pm

सुन्दर और मार्मिक रचना।  बधाई स्वीकारें।   सादर,

Comment by KAVI DEEPENDRA on May 4, 2013 at 6:38pm

प्रदीप जी, COONTEE JI आपका बहुत-बहुत आभार.....

Comment by coontee mukerji on May 4, 2013 at 5:17pm

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .

मैं तुम्हारे संग बीते कुछ पलों को जी रहा हूँ......

सत्य ये है तुम बिना जीवित कहाँ अजी रहा हूँ....

देखते ही देखते "कल" हो गया है "आज" सारा....

किन्तु मैं निष्प्राण सा बस अब तलक माज़ी रहा हूँ.......सादर / कुंती

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 4, 2013 at 5:11pm

कितना उदास मिट्टी लगा सन्दूक सच तेरे बिना है......

कोई पूछे इस हृदय से जिसका एक मोती छिना है...

आपका हार्दिक स्वागत है. 

सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकार करें 

सादर 

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