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तेरी आँखों के सिवा और नज़ारा क्या है

तेरी आँखों के सिवा और नज़ारा क्या है
तुझमे मिलती है खुशी और सहारा क्या है

तेरी यादों की कोई रुत तो नहीं होती, गो  
दिल तड़प तो रहा है ये इशारा क्या है

गम हैं तो और मुहब्बत के सिवा किस्मत में
और गम में किसी हो मौज इज़ारा क्या है

चाँद निकले है शब-ए-हिज़्र मगर कह दे तू
माह-ए-दह्र में कुछ भी यूँ हमारा क्या है

दिल जला है यूँ बहुत, खाक सिवा सर पे तू
तेरी यादों के सिवा और ये हारा क्या है !!

नोट:- मैंने ये गज़ल ३०मि में लिखी है. मुझे पता है इसमें बहुत खामियाँ होंगी. मैं आप सभी जानकार दोस्तों का बहुत ज्यादा शुक्रगुज़ार हूँगा जो इसे और दुरस्त करने में मदद करेंगे.आप सभी से ऐसी उम्मीद है.
इसकी बह्र है २१२२ ११२२ ११२२ २२.

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Comment by Raj Tomar on January 9, 2013 at 1:41am

बहुत बहुत शुक्रिया, अशोक जी. :)

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 6, 2013 at 10:57am

तेरी यादों की कोई रुत तो नहीं होती, गो  
दिल तड़प तो रहा है ये इशारा क्या है.......................वाह बहुत बढ़िया.

सुन्दर गजल. गजल के बारे में बहुत जानकारी तो नहीं किन्तु पढकर आनंद आया. बधाई स्वीकारें.

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