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ग़ज़ल - खूब भटका है दर-ब-दर कोई

एक और ग़ज़ल पेश -ए- महफ़िल है,
इसे ताज़ा ग़ज़ल तो नहीं कह सकता, हाँ यह कि बहुत पुरानी भी नहीं है
गौर फरमाएँ

खूब भटका है दर-ब-दर कोई |

ले के लौटा है तब हुनर कोई |

अब पशेमां नहीं बशर कोई |
ख़ाक होगी नई सहर कोई |

हिचकियाँ बन्द ही नहीं होतीं,
सोचता होगा किस कदर कोई |

गमज़दा देखकर परिंदों को,
खुश कहाँ रह सका शज़र कोई |

धुंध ने ऐसी साजिशें रच दीं,
फिर न खिल पाई दोपहर कोई |

कोई खुशियों में खुश नहीं होता,

गम से रहता है बेखबर कोई |

पाँव को मंजिलों की कैद न दे,
बख्श दे मुझको फिर सफर कोई |

गम कि कुछ इन्तेहा नहीं होती,
फेर लेता है जब नज़र कोई |

सामने है तवील तन्हा सफर
मुन्तजिर है न मुन्तज़र कोई 

बेहयाई की हद भी है 'वीनस',
तुझपे होता नहीं असर कोई |

१३- ०५ - २०१२

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Comment

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Comment by Saurabh Pandey on December 19, 2012 at 1:14am

यही कारण है संदीप भाई से इतना कुछ कहता हूँ..  

Comment by वीनस केसरी on December 19, 2012 at 1:04am

खुले दिल से मिली दाद और हौसला अफजाई के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ


@ संदीप पटेल भाई, अब खुद को नौसिखिया कहना बंद कर दीजिए ... आपकी ग़ज़ल पढ़ने के बाद अब आप पर यह शब्द 'सूट' नहीं करता है

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on December 17, 2012 at 6:43pm

वाह-वा! वाह-वा! क्या बात है भाई वीनस जी! ये बेहतरीन ग़ज़ल बड़ी देर से साझा कि! ख़फ़ीफ़ में मैंने बहुत से शानदार ग़ज़लें सुनी हैं और आज यह भी उनमें सम्मिलित हो गई! उम्दा कहन! हुस्ने मतला बहुत अच्छा लगा! मगर पर्सनल च्वाइस कहूँ तो...

पाँव को मंज़िलों की क़ैद न दे,

बख़्श दे मुझको फिर सफ़र कोई; --> लाजवाब तेवर.. दिल छू गए आप.. बधाईयां स्वीकार हों..

Comment by नादिर ख़ान on December 17, 2012 at 4:11pm

पाँव को मंजिलों की कैद न दे, 
बख्श दे मुझको फिर सफर कोई | 

गम कि कुछ इन्तेहा नहीं होती, 
फेर लेता है जब नज़र कोई |

Behtareen agaz, umda ashaar, apne andaz men khubsurat maqta.

bahut khub adarniy vinus ji.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 17, 2012 at 3:58pm

बेहतरीन ग़ज़ल कही है साहब
हम नौसीखियों के लिए इक और पाठ
कहाँ गिराना है कौन सा हर्फ़ सीख सको तो सीख लो
बहुत बहुत बधाई सर जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 17, 2012 at 3:21pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल है वीनस जी। कुछ शे’र तो बेहद खूबसूरत हैं। जैसे

खूब भटका है दर-ब-दर कोई |
ले के लौटा है तब हुनर कोई |

हिचकियाँ बन्द ही नहीं होतीं,
सोचता होगा किस कदर कोई |

गमज़दा देखकर परिंदों को,
खुश कहाँ रह सका शज़र कोई |

धुंध ने ऐसी साजिशें रच दीं,
फिर न खिल पाई दोपहर कोई |

कोई खुशियों में खुश नहीं होता,

गम से रहता है बेखबर कोई |

पाँव को मंजिलों की कैद न दे,
बख्श दे मुझको फिर सफर कोई |

गम कि कुछ इन्तेहा नहीं होती,
फेर लेता है जब नज़र कोई |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 17, 2012 at 2:02pm

क्लीयर हुआ. .. :-)))

Comment by Abhinav Arun on December 17, 2012 at 1:25pm

हिचकियाँ बन्द ही नहीं होतीं, 
सोचता होगा किस कदर कोई | 

गमज़दा देखकर परिंदों को, 
खुश कहाँ रह सका शज़र कोई |

धुंध ने ऐसी साजिशें रच दीं, 
फिर न खिल पाई दोपहर कोई |

कोई खुशियों में खुश नहीं होता,
 
गम से रहता है बेखबर कोई |

शानदार गज़ल श्री विनस जी , ये शेर खास तौर पर पसन्द आये हार्दिक  बधाई इस सशक्त गज़ल पर !!

Comment by वीनस केसरी on December 17, 2012 at 12:45pm

saurabh ji
Is ghazal ko 2122 / 1212 / 22 par taktiA karke dekhe.n

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 17, 2012 at 12:12pm

आदरणीय वीनस भाई लाजवाब ग़ज़ल कही है सबके सब अशआर भरपूर आनंद दे रहे हैं, पढ़कर तरोताजा हो गया हूँ भर-2 कर दिली दाद और बधाई स्वीकारे.

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