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ग़ज़ल - वो हर कश-म-कश से बचा चाहती है

मित्रों, कई दिन के बाद एक ग़ज़ल के चंद अशआर हो सके हैं, आपकी मुहब्बतों के नाम पेश कर रहा हूँ

वो हर कश-म-कश से बचा चाहती है |

वो मुझसे है पूछे, वो क्या चाहती है |

यूँ तंग आ चुकी है इन आसानियों से,

हयात अब कोई मसअला चाहती है |

उन्हें सोच लूँ या करूँ इसको पूरी,

ये ताज़ा ग़ज़ल जो हुआ चाहती है |

ये नाज़ुक सा रिश्ता रहे ? टूट जाये ?

समझ में न आए वो क्या चाहती है |

पढ़ो खुद को 'वीनस' समझ जाओगे तुम,

अभी शाइरी तज्रिबा चाहती है |

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on March 7, 2013 at 3:23am

@ राज बुन्देली साहिब आपका बहुत बहुत शुकिया

Comment by वीनस केसरी on March 7, 2013 at 3:22am

@नादिर खान साहिब, आपकी नवाज़िश है

Comment by भावना तिवारी on February 22, 2013 at 7:12pm

उन्हें सोच लूँ या करूँ इसको पूरी,

ये ताज़ा ग़ज़ल जो हुआ चाहती है |

 .........wah ..sundar kahan ...

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 15, 2013 at 11:47pm

वाह वीनस भाई... सुन्दर ग़ज़ल...

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 13, 2013 at 12:00pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है वीनस जी, दाद कुबूल करें

Comment by Abhinav Arun on February 11, 2013 at 9:02pm

वाह लाजावाब श्री वीनस जी -

यूँ तंग आ चुकी है इन आसानियों से,

हयात अब कोई मसअला चाहती है |

Comment by Alpana Verma on February 10, 2013 at 12:33am

उम्दा  ग़ज़ल.

Comment by vijay nikore on February 6, 2013 at 6:48pm

आदरणीय वीनस जी:

सारी गज़ल बहुत ही अच्छी बनी है।

बधाई।

विजय निकोर

Comment by वीनस केसरी on February 6, 2013 at 4:26am

इस ज़र्रा नवाजी के लिए आप सभी का तहे दिल से आभारी हूँ ....

Comment by SALIM RAZA REWA on February 5, 2013 at 9:32pm

पढ़ो खुद को 'वीनस' समझ जाओगे तुम,

अभी शाइरी तज्रिबा चाहती है |   achha sher hai vinas ji .. mubark bad qubuleN

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