For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

भारत के हम शेर किये नख के बल रक्षित कानन को।
छोड़त हैं कभि नाहिं उसे चढ़ आवहिं आँख दिखावन को।
भागत हैं रिपु पीठ दिखा पहिले निजप्राण बचावन को।
घूमत हैं फिर माँगन खातिर कालिख माथ लगावन को॥

Views: 975

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 26, 2012 at 2:01pm

आपका हार्दिक स्वागत है आदरणीय गुरुदेव .......लेखन के बारे में आपके कहे का शत प्रतिशत समर्थन करता हूँ .......आपके द्वारा किया गया संशोधन वास्तव में गेयता को गति प्रदान कर रहा है .......आप मेरे गुरु हैं ......शिष्य अपने गुरु से ही तो सीखता है ......

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 26, 2012 at 1:33pm
ठीक कहा है अपने आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी,लेखन में संशोधन एक अनवरत प्रक्रिया है जब तक कि विधा और शिल्प पर रचना 
शब्द, कथ्य और तथ्य से पग न जाय.।छंद के नियम भी उतने ही आवश्यक है, क्योंकि लिपिबद्ध छंद मे त्रुटी क्षम्य नहीं हो सकती ।
आपकी  सापेक्ष टिप्पणियों और सुझावों के लिए साधुवाद । साभार 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 26, 2012 at 11:50am

वस्तुतः लेखन और उसमें संशोधन एक अनवरत प्रक्रिया है जब तक कि विधा और शिल्प पर कोई रचना शब्द, कथ्य और तथ्य से पग न जाय.

अब देखिये न प्रस्तुत छंद के आखिरी पद में धरती-वन के स्थान पर वसुधा-वन समझ में आ रहा है जो छंद की गेयता को संतुष्ट भी कर रहा है. अतः, इसे संशोधित कर लिया जाय .. .   :-)))

भारत के हम शेर, रखें मन-प्राण सुरक्षित कानन को
मेट रहे बल-पौरुष से दिखते हर संकट कारण को
भाग चला हर शत्रु लिए तन-मोह ढके निज आनन को
विश्व कहे, हम वीर खरे दिल से रखते वसुधा-वन को


यह सवैया-रचना हर तरह से आपकी रचना है, भाई अजीतेन्दु. हम पाठकगण उसे निहार कर अपने हिसाब से सजाते भर हैं. रचनाओं पर ऐसे मंतव्य पाठकीय हुआ करते हैं.

शुभेच्छाएँ

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 26, 2012 at 11:27am

आदरणीय गुरुदेव .........अत्यंत सुन्दर ......अपने शिष्य के प्रति ये आपका स्नेह है .....आपके और मेरे, दोनों के सम्मिलित प्रयास से ये सवैया लिखा गया .....यह विचार ही मन को बहुत आनंदित कर रहा है  .....आपका हार्दिक आभार .........


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 26, 2012 at 11:13am

भाई अजीतेन्दुजी, आपकी कोशिश रंग लायी है. इस प्रयास पर आपको हृदय से धन्यवाद और अतिशय बधाइयाँ.

आपका प्रयास, आपकी लगन और आपका सतत अध्ययन आश्वस्त तो करते ही हैं अन्य रचनाकर्मियों के लिये एक उन्नत उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं कि मात्र लेखन और उनका प्रस्तुतिकरण ही नहीं, संयत साहित्य-साधना और उचित अध्ययन भी उतनी ही आवश्यक है. बिना विधा की यथोचित जानकारी के लेखनकर्म अपना तथा पाठक दोनों के समय की बरबादी का कारण हैं. 

मैंने आपके सुगढ़ प्रयास पर अपने मंतव्य दिये हैं. अवश्य बताइयेगा, अपना मिलजुल हुआ प्रयास कैसा बन पड़ा है -

भारत के हम शेर, रखें मन-प्राण सुरक्षित कानन को
मेट रहे बल-पौरुष से दिखते हर संकट कारण को
भाग चला हर शत्रु लिए तन-मोह ढके निज आनन को
विश्व कहे, हम वीर खरे दिल से रखते धरती-वन को

शुभेच्छाएँ... .

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 26, 2012 at 8:51am

आदरणीय गुरुदेव .......आपका हार्दिक आभार ..........आपने पहली पंक्ति के हिंदी के प्रारूप को ही बाकी कि पंक्तियों में भी बनाये रखने को कहा है ......कृपया इन पंक्तियों पर विचार करें .......

भारत के हम शेर किये नख के बल रक्षित कानन को।
चीर दिया हर बार सदा बढ़ते हुए संकटकारण को।
भाग चले रिपु पीठ दिखा ढकते निजप्राण व आनन को।
हाल सुना अब हैं फिरते सब कालिख माथ लगा वन को॥

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 26, 2012 at 8:36am

आदरणीय रक्ताले सर .......आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ......आपने जो शब्द सुझाये हैं बिलकुल उनका उपयोग भी हो सकता है .........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 26, 2012 at 8:28am

 हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण सर ........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 26, 2012 at 8:27am

आदरणीय कुशवाहा सर ........आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ........

Comment by Ashok Kumar Raktale on November 25, 2012 at 8:18pm

आदरणीय गौरव जी 

                     सुन्दर मदिरा सवैया के लिए बधाई स्वीकारें. दूसरी पंक्ति में कभि नाहि कि जगह कबहूँ न  का उपयोग किया होता तो और भी सुंदरता बढ़ जाती ऐसा मुझे लगता है. 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

प्रवाह, बुद्धिमत्ता और भ्रम का खेल सिद्धांत (लेख)

मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल…See More
13 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय सौरभ जी इस छन्द प्रस्तुति की सराहना और उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार "
13 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश जी प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार "
14 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक जी प्रस्तुत छंदों पर  उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार "
14 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"सूरज होता उत्तरगामी, बढ़ता थोड़ा ताप। मगर ठंड की अभी विदाई, समझ न लेना आप।।...  जी ! अभी ठण्ड…"
14 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदयतल से आभार.…"
14 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत सरसी छंदों की सराहना के लिए आपका हृदय से आभार. मैं…"
14 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभा पाण्डे जी सादर, प्रदत्त चित्र पर सरसी छंद की मेरी प्रस्तुति की सराहना के लिए आपका…"
14 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"  आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपकी प्रस्तुति का स्वागत है.     मौसम बदला नहीं जरा…"
14 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय  सौरभ भाईजी उत्साहवर्धक टिप्पणी  के लिए हार्दिक धन्यवाद आभार आपका।  गणतंत्र…"
15 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी सुन बसंत की आहट दर पर,बगिया में उत्साह। नव कलियों से मिलने की है,भौरे के मन…"
15 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी आपने जनवरी मास के दो प्रमुख त्योहारों को छंद में सुंदर  आबद्ध  किया है…"
15 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service