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वो नर नाहिं रहे डरते डरते सबसे नित आप हि हारे।
पामर भाँति चले चरता पशु भी अपमान सदा कर डारे।
मानव जो जिए गौरव से अपनी करनी करते हुए सारे।
जीवन हैं कहते जिसको बसता हिय में निजमान किनारे॥

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 24, 2012 at 9:48pm

स्नेह के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय बड़े भैया गणेश जी .........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 24, 2012 at 9:46pm

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीया राजेश जी ........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 24, 2012 at 9:45pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण सर .........


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 24, 2012 at 8:42pm

एक बार पुनः आपने अच्छी रचना प्रस्तुत की है, बहुत ही संदेशात्मक रचना है, बधाई अनुज |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 24, 2012 at 6:45pm

बहुत सुन्दर बात कही है सवैया के माध्यम से जो इंसान खुद का सम्मान नहीं करना जानता तो दूसरों से उम्मीद कैसी बहुत बहुत बधाई अजीतेंदु जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 24, 2012 at 10:46am

मत्तगयन्द सवैया रचते वे देते गौरव सन्देश सवेरे,

गौरव गाथा गाते ईश दुआ में हम सब उठ रोज सवेरे 

 

 

 

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