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मुक्तिका; बेवफा से ... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका;
बेवफा से ...
संजीव 'सलिल'
*
बेवफा से दिल लगा के, बावफा गाफिल हुआ। 
अधर की लाली रहा था, गाल का अब तिल हुआ।।

तोड़ता था बेरहम अब, टूटकर चुपचाप है।
हाय रे! आशिक 'सलिल', माशूक का क्यों दिल हुआ?

कद्रदां दुनिया थी जब तक नाश्ते की प्लेट था।
फेर लीं नजरों ने नजरें, टिप न दी, जब बिल हुआ।।

हँसे खिलखिल यही सपना साथ मिल देखा मगर-
ख्वाब था दिलकश,  हुई ताबीर तो किलकिल हुआ।।

'सलिल' ने माना था भँवरों को  कँवल का मीत पर-
संगदिल भँवरों के मंझधार भी साहिल हुआ।।

*****


Acharya Sanjiv verma 'Salil'

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Comment by sanjiv verma 'salil' on October 14, 2012 at 5:42pm

अविनाश जी, योगराज जी, संदीप जी, राजेश कुमारी जी, वीनस जी, अम्बरीश जी, गणेश जी

आप सबको सादर नमन.
आपने मुक्तिका को सराह कर उत्साह वर्धन किया धन्यवाद.
प्रसन्नता है कि आप सब मुझे याद रखे हैं.
वीनस जी आप जब चाहें सीधे बात कर लिया करें... ०९४२५१८३२४४ या ०७६१ २४१११३१. अभी तो आपके दिल की पुकार सीधे ही मुझे खींच ले गयी.
ओबीओ को मैंने अपना ही मंच माना है. वातावरण और नियमों के परिवर्तन के कारण नियमित उपस्थिति संभव  नहीं हो पाती है.
लगभग हर दिन ओबीओ पर एक बार दृष्टिपात तो करता ही हूँ. सबको नमन.

Comment by AVINASH S BAGDE on October 12, 2012 at 7:05pm

अधर की लाली रहा था, गाल का अब तिल हुआ।।kya bat hai..wah.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 10:52am

लाजवाब मुक्तिता आदरणीय आचार्य जी, दिल से बधाई.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 12, 2012 at 9:19am

आदरणीय सलिल सर जी सादर प्रणाम
आपकी इस मुक्तिका ने मन मोह लिया
हर मुक्त द्विपंक्ति सुन्दर और सुगढ़ है
भाव शिल्प कथ्य सभी का सुन्दर समावेश किया है आपने
ह्रदय से बधाई इस अनुपम काव्य रचना हेतु


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 12, 2012 at 9:10am

कद्रदां दुनिया थी जब तक नाश्ते की प्लेट था।
फेर लीं नजरों ने नजरें, टिप न दी, जब बिल हुआ।।---मतलबपरस्त अहसान फरामोशी का अच्छा नमूना पेश किया ---बहुत ही अच्छी मुक्तिका मुझे तो ग़ज़ल लगी 

Comment by वीनस केसरी on October 12, 2012 at 1:00am

आदरणीय आचार्य जी कितना हसीन इत्तेफाक है कि अभी परसों ही सौरभ जी से आपका हाल चाल मालूम कर रहा था और उनसे निवेदन कर रहा था कि आपको यहाँ सक्रिय होने के लिए आपसे संपर्क करें और आज आप प्रकट हो गये
कहीं उन्होंने आपसे संपर्क तो नहीं किया या सच में यह महज इत्तेफाक है

तोड़ता था बेरहम अब, टूटकर चुपचाप है।
हाय रे! आशिक 'सलिल', माशूक का क्यों दिल हुआ?

इस शेर की तो जो तारीफ़ करू कम है
बेहद घिसी पिटी बात को आपने जिस बारीकी से नयेपन का जामा पहनाया है वह लाजवाब है
सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 11, 2012 at 11:56pm

आदरणीय आचार्य जी, सादर प्रणाम !

आपके द्वारा रचित यह अनमोल मुक्तिका हमें बहुत  भायी! इसे हम सभी के मध्य साझा करने के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें !सादर  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 11, 2012 at 10:36pm

आदरणीय आचार्य जी, ओ बी ओ आपको और आपकी रचनाओं को सदैव मिस करता रहता है | आपकी यह रचना बहुत ही अच्छी लगी, उस्तादों वाली बात है इस अभिव्यक्ति में, बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें |

कृपया ध्यान दे...

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