For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कुरंग (बैरवे) पर एक प्रयास.

देख पिया को सम्मुख,मन हर्षाय,

देखे मुख को गौरी,नयन घुमाय/

 

पागल प्रेम दिवानी,पिया रिझाय,

सुधबुध खोकर अपनी,झूमति जाय/

 

हाथ धरे कभी शीश,चुमती जाय,

बनी मतवाली रीझ,घुमती जाय/

 

मुस्काय दिल पर हाय,घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके,चैन न पाय/

 

प्रेम पगे दिल आयी,मिलन कि चाह,

प्रेम बिना सूझे नहि, दूजी राह/

Views: 796

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 12, 2012 at 7:19pm

आदरणीय अम्बरीश जी

              सादर प्रणाम, आपके थोड़े परिवर्तन से ही बैरवे कि रंगत निखर आयी है. मै आगे जब बरवै  लिखूंगा तो  इस प्रकार का निखार लाने कि पूरी कोशिश करूँगा. आपके असीम सहयोग के लिए हार्दिक आभार.

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 12, 2012 at 7:15pm

आदरणीय प्रभाकर जी

                     सादर प्रणाम, सही कहा आपने शब्दों के मूलस्वरूप पर ध्यान देना आवश्यक है मेरा इस बात पर ध्यान कुछ कम था. आपके महत्वपूर्ण सुझाव के लिए आभार.

Comment by AVINASH S BAGDE on October 12, 2012 at 6:57pm

मुस्काय दिल पर हाय,घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके,चैन न पाय/

wah..

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 12, 2012 at 5:34pm

आपके प्रयास को सलाम श्री अशोक रक्ताले जी 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 4:57pm

//हाथ धरे कभी शीश,चूमे जाय,
बनी मतवाली रीझ,घूमे जाय//

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी आपने सार्थक सुझाव देकर सम चरणों की समस्या का पूर्ण निदान कर दिया है जिसके लिए साधुवाद .... फिर भी इसके विषम चरणों में मामूली सी त्रुटि अभी भी शेष है ....जिसे मेरे विचार में निम्न प्रकार से सुधारना बेहतर रहेगा ....  

//शीश धरे कर मस्तक, चूमे जाय,

मतवाली बन रीझे,  घूमे  जाय//

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 4:47pm

//देख पिया को सम्मुख, मन हर्षाय,

देखे मुख को गौरी, नयन घुमाय//

अति सुन्दर बरवै ...

 

//पागल प्रेम दिवानी, पिया रिझाय,

सुधबुध खोकर अपनी, झूमति जाय//

यह भी कुछ कम नहीं ….

 

//हाथ धरे कभी शीश,चुमती जाय,

बनी मतवाली रीझ,घुमती जाय//

//शीश धरे कर मस्तक, चूमे जाय,

मतवाली बन रीझे,  घूमे  जाय//

 

//मुस्काय दिल पर हाय,घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके,चैन न पाय//

मुस्काये अरु दिल पर, घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके, चैन न पाय// 

 

//प्रेम पगे दिल आयी, मिलन कि चाह,

प्रेम बिना सूझे नहि, दूजी राह//

//प्रेम पगे दिल  मिल लें , ऐसी  चाह,

प्रेम बिना नहि सूझे,  दूजी राह//

बरवै रचने के इस सद्प्रयास के लिए बहुत बहुत बधाई !


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 10:49am

बरवै छंद में सुन्दर अभिव्यक्ति दी है आदरणीय रक्ताले जी. लेकिन कहीं कहीं मात्राएँ बराबर करने की गरज से शब्दों से मूल स्वरूप से खिलवाड़ दुरुस्त नही लग रहा. उदाहरण के तौर पर:


//हाथ धरे कभी शीश,चुमती जाय,
 बनी मतवाली रीझ,घुमती जाय// इसे अगर यूं कर लिया जाये तो कैसे रहेगा?

हाथ धरे कभी शीश,चूमे जाय,
बनी मतवाली रीझ,घूमे जाय

बहरहाल इस सद्प्रयास हेतु मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service