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जिंदगी रूठ के मुझसे कहीं खोई होगी

जिंदगी रूठ के मुझसे कहीं खोई होगी 

तकिये में मुंह छिपाकर रोई होगी 

जल गई थी जो अरमानों की फसल 

यंकी नहीं कि फिर से बोई होगी 

बढ़ गई होंगी जब दिल की बेताबियाँ 

टूटी मेरी तस्वीर फिर संजोई होगी

मैं जानता हूँ हाल इस वक़्त भी उसका  

शबनम ओढ़ के पलकों पे सोई होगी  

                 ***** 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 20, 2012 at 5:14pm

सतीश कुमार जी इस खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 20, 2012 at 5:13pm

अशोक कुमार रक्तेला जी  आपका कमेन्ट पढ़ा इस ग़ज़ल पर बहुत अच्छा लगा हार्दिक आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 20, 2012 at 5:12pm

गणेश जी बागी जी बहुत दिनों बाद अपने ब्लॉग में बीच में झाँकने का आज मौका मिला आपका कमेन्ट पढ़ा इस ग़ज़ल पर बहुत अच्छा लगा हार्दिक आभार आपका 

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 22, 2012 at 8:55pm

जिंदगी के कुछ उदासी भरे क्षणों पर रची सुन्दर रचना. बधाई.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 21, 2012 at 7:11pm

आदरणीया ये दिल मांगे मोर ....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 21, 2012 at 1:53pm

योगराज  जी बहुत बहुत  हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 21, 2012 at 1:52pm

 प्राची जी बहुत बहुत  हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 21, 2012 at 1:51pm

अविनाश बागडे जी हार्दिक आभार 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2012 at 1:09pm

बहुत खूब राजेश कुमारी जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 21, 2012 at 11:57am

जल गई थी जो अरमानों की फसल 

यंकी नहीं कि फिर से बोई होगी !

भावात्मक रचना के लिए बधाई आदरणीया राजेश कुमारी जी..

कृपया ध्यान दे...

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