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ज़िंदगी कर दी सनम तेरे हवाले अब तो

ज़िंदगी कर दी सनम तेरे हवाले अब तो।
तू भी बढ़के मुझे सीने से लगा ले अब तो॥

दूर रहता हूँ तो आँखों में नमी रहती है,
मैं भी हँस लूँ तू ज़रा पास बुला ले अब तो॥

हर जगह तू ही तू अब मुझको नज़र आता है,
रास आते नहीं मस्जिद ये शिवाले अब तो॥

ज़िंदगी इस तरह मत बाँट मुझे टुकड़ों में,
रोज़ घुट घुट के ये मरने से बचा ले अब तो॥

दाम बढ़ने को है बाज़ार में अब मेरा भी,
जौहरी तू मुझे मिट्टी से उठा ले अब तो॥

ज़िंदगी को किया लाचार है मंहगाई ने,
छीनने है लगी मुफ़लिस के निवाले अब तो॥

और कुछ दूर ही मंज़िल है न घबरा “सूरज”,
हँस के कहते हैं मेरे पावों के छाले अब तो॥

  • डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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Comment

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Comment by UMASHANKER MISHRA on June 3, 2012 at 10:05am

बेहेतरीन गजल

हर जगह तू ही तू अब मुझको नज़र आता है,
रास आते नहीं मस्जिद ये शिवाले अब तो॥ डॉ.सूर्या बाली जी हार्दिक बधाई

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 18, 2012 at 6:12pm

आदरणीय बाली जी
                नमस्कार,
                           दाम बढ़ने को है बाज़ार में अब मेरा भी,
                           जौहरी तू मुझे मिट्टी से उठा ले अब तो॥
बहुत सुन्दर गजल . बधाई.

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 14, 2012 at 3:27pm

ज़िंदगी इस तरह मत बाँट मुझे टुकड़ों में,
रोज़ घुट घुट के ये मरने से बचा ले अब तो॥

और कुछ दूर ही मंज़िल है न घबरा “सूरज”,
हँस के कहते हैं मेरे पावों के छाले अब तो॥

बहुत सुन्दर ..हाँ अब सूरज निकलने ही वाला है ...छाले और पेशानी पर पड़े बल अब रंग तो लायेंगे ही ...डॉ सूरज जी ...बधाई ..भ्रमर ५ 

Comment by Yogi Saraswat on May 14, 2012 at 12:26pm

ज़िंदगी इस तरह मत बाँट मुझे टुकड़ों में,
रोज़ घुट घुट के ये मरने से बचा ले अब तो॥

दाम बढ़ने को है बाज़ार में अब मेरा भी,
जौहरी तू मुझे मिट्टी से उठा ले अब तो॥

बहुत खूब , आदरणीय डॉ. बाली ! आज मैं भी इस मंच पर आ गया हूँ !

Comment by Ajay Kumar Dubey on May 13, 2012 at 5:27pm

बहुत सुन्दर गज़ल डा. साहब.

बधाई


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 11, 2012 at 9:01pm

दाम बढ़ने को है बाज़ार में अब मेरा भी,
जौहरी तू मुझे मिट्टी से उठा ले अब तो

बहुत खूब डॉ साहब, जिस प्रकार काफिया और रदीफ़ का निर्वहन आपके द्वारा किया गया है वो काबिले गौर है, सभी शेर बढ़िया कहे है , कुल मिलकर एक अच्छी ग़ज़ल की प्रस्तुति | दाद कुबूल करें श्रीमान |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 9, 2012 at 5:12pm

वाह बहुत उम्दा ग़ज़ल लिखी है डा सूर्या बाली जी 

Comment by Raj Tomar on May 9, 2012 at 2:07pm

bahut sundar. :)

Comment by MAHIMA SHREE on May 8, 2012 at 10:04pm

दूर रहता हूँ तो आँखों में नमी रहती है,
मैं भी हँस लूँ तू ज़रा पास बुला ले अब तो॥

हर जगह तू ही तू अब मुझको नज़र आता है,
रास आते नहीं मस्जिद ये शिवाले अब तो॥...

आदरणीय डॉक्टर सूरज जी, नमस्कार  .बहुत ही खुबसूरत गज़ल ..बधाई  स्वीकार करें

 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 8, 2012 at 9:33pm

bahut sundar ghazal kahi aapne dr. sahab ...............waah kya baat hai .....laajwaab

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