For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गोरी के आंचल में 

झिलमिल सितारे हैं 

चंदा को सूरज भी 

छिप के निहारे है 

------------------------

रेत के समंदर में 

बूँद एक उतरी तो 

ललचाई नजरों ने 

सोख लिया प्यारी को 

----------------------------

उदय अंत में त्रिशंकु -

बन ! मै लटकता हूँ 

राहु -केतु से कटे भी 

दंभ लिए फिरता हूँ 

---------------------------

चार दिन की जिन्दगी है 

चार पल की यारी है 

चाँद भी खिसक गया 

रात अंधियारी हैं 

-------------------------

कल अंडा था 

बच्चा बनकर 

चीं चीं चूं चूं बोला 

खेला खाया 

उड़ा साथ कुछ 

मै रह गया अकेला 

Views: 632

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 26, 2012 at 11:09pm

 प्रिय बंधुगण आप सब का बहुत बहुत आभार ..अपना स्नेह और सुझाव देते रहें .... जय श्री राधे 

भ्रमर ५
भ्रमर का दर्द और दर्पण  
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 18, 2012 at 10:59pm

चार दिन की जिन्दगी है 

चार पल की यारी है 

चाँद भी खिसक गया 

रात अंधियारी हैं 

गोरी के आंचल में 

झिलमिल सितारे हैं 

चंदा को सूरज भी 

छिप के निहारे है 

kitni khubsurti se varnan kiya hai, aadarniya bhramar ji badhai, saadar abhivadan ke saath.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 18, 2012 at 5:52am
अकेले में ही कविता ज्यादा निकलती है, बंधुवर! वियोगी था वो पहला कवि!
नयी श्रोतों से परिचय करते रहे, कविता रूपी गंगा से स्नान करते रहें!  
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 18, 2012 at 12:00am

प्रिय और आदरणीय मित्र गण आप सब का हार्दिक आभार -अपना स्नेह बनाये रखें 

भ्रमर ५ 
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 17, 2012 at 6:47pm
प्रिय भ्रमर जी,
वाह-वाह... यहाँ आते ही आपने अपना रंग जमा दिया है| बेहतरीन कविता के लिए हार्दिक बधाई आपको|
Comment by आशीष यादव on April 17, 2012 at 5:13pm

लाख अपराध कर ले
चाहिए फिर भी
सभ्य समाज 
ये दुनिया की रस्मे ...................

Comment by अरुण कान्त शुक्ला on April 16, 2012 at 6:36pm

चार दिन की जिन्दगी है 

चार पल की यारी है 

चाँद भी खिसक गया 

रात अंधियारी हैं

सुबह भी होगी .. सुन्दर .

Comment by Brij bhushan choubey on April 16, 2012 at 2:35pm

चार दिन की जिन्दगी है 

चार पल की यारी है 

चाँद भी खिसक गया 

रात अंधियारी हैं 

-------------------------बहुत सुन्दर |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 16, 2012 at 12:42pm

रेत के समंदर में 

बूँद एक उतरी तो 

ललचाई नजरों ने 

सोख लिया प्यारी को 

-----bahut sundar kshanikayen likhi hain ek se badhkar ek.

Comment by Abhinav Arun on April 16, 2012 at 12:38pm

चार दिन की जिन्दगी है 

चार पल की यारी है 

चाँद भी खिसक गया 

रात अंधियारी हैं 

shri भ्रमर जी बहुत खूबसूरत रचना हार्दिक बधाई आपको !!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"नमन मंच  सादर अभिवादन "
11 minutes ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"2122 1212 112 बाप ख़ुद की ख़ुशी को भूल गया आज बेटा उसी को भूल गया १ ज़ीस्त की उलझनों में यूँ…"
12 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। गिरह सहित सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
4 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"2122, 1212, 112**बिसलरी पा  नदी को भूल गयाहर अधर तिस्नगी को भूल गया।१।*पथ की हर रौशनी को भूल…"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"सादर अभिवादन।"
8 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"क्या गिला वो किसी को भूल गय इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया अम्न का ख़्वाब देखा रात को इक और फिर रात…"
12 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"सादर अभिवादन "
12 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"स्वागतम"
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"प्रस्तुति का सहज संशोधित स्वरूप।  हार्दिक बधाई"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रदत्त चित्र को आपने पूरे मनोयोग से परखा है तथा अंतर्निहित भावों को…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी, आपने प्रस्तुति के माध्यम से प्रदत्त चित्र को पूरी तरह से शाब्दिक किया है…"
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service