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कितना अच्छा लगता है

कितना अच्छा लगता है

यूँ अनायास मिलना

दुनियाँ के गलियारों में

साथ-साथ फिरना

 

अभी छू गई है

पुरवाई गालों को

दे गया चुनौती कौन

दर्द के उबालों को

 

दहलीज को चूम रहे

आँगन अमलतास के

उधेड़ दो न अब घूंघट

क्षणजीवी प्यास के

 

कितनी भारी है

आँखों का सूनापन

सोया सा लगता है

सांसों का सूनापन

 

मन से टकराता है

ऐसे सन्नाटा

कंठ में चुभे जैसे

सेही का कांटा

 

पोर पोर में सरसों फूली

आँखें रसमसाती

मधु अतीत की सुगंध पीकर

पांखें कसमसाती

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Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:53am

आदरणीय भ्रमर जी ! जय श्री राधे. रचना की सराहना के लिए आभार.

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:51am

आदरणीय जवाहर जी ! सादर अभिवादन!  सराहना के लिए आभार.

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:50am

आदरणीय गणेश जी ! सादर अभिवादन! रचना की सराहना के लिए आभार.

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:49am

आदरणीय प्रदीप जी ! सादर अभिवादन! सराहना के लिए आभार.

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:47am

धन्यवाद !मृदु जी.सराहना के लिए आभार.

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:44am

संदीप जी !सादर अभिवादन! मैं तो आपकी गजलों का  प्रशंसक हूँ.आपकी सराहना मिली,अच्छा लगा.

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:40am

धन्यवाद ! महिमा जी.आपको रचना पसंद आई,यह जानकर अच्छा लगा.सराहना के लिए आभार.

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on April 8, 2012 at 9:37am

सादर अभिवादन! आदरणीया राजेश कुमारी जी.सराहना के लिए आभार.

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 8, 2012 at 12:04am

पोर पोर में सरसों फूली

आँखें रसमसाती

मधु अतीत की सुगंध पीकर

पांखें कसमसाती..

राजीव जी गजब का शब्द बंधन और पोर पोर में रम जाने वाले भाव ...मुबारक हो 
जय श्री राधे 
भ्रमर 5


Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 7, 2012 at 7:56am

अभी छू गई है

पुरवाई गालों को

दे गया चुनौती कौन

दर्द के उबालों को

भावाभियक्ति एवं मर्म का स्पष्ट चित्रण करती रचना पर बधाई स्वीकार करें!

कृपया ध्यान दे...

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