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फूलों की चोरी

उषा अवस्थी

फूलों की चोरी

बिना किसी परिश्रम

न पानी डालने का श्रम
न माली के खर्च का गम
पकी -पकाई रोटियाँ 
खाने को तैयार
करने को प्रभु को प्रसन्न
सर्व सुलभ हथियार

कुछ कर्म करते-करते
स्वाभाविक हो चले हैं
वह पाप नहीं

आदत में शुमार,
लगते भले हैं

उनके लिए यह चोरी नहीं
साधारण सी बात है
दूसरों की मेहनत
उनकी ख़ैरात है

चोरी का आरम्भ ,
उस पेन्सिल के समान
जिस कारण,फाँसी पर
झूलने से पहले
भरी अदालत में
अपने ही बेटे ने
काटे,माँ के कान

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Usha Awasthi on September 3, 2023 at 10:28pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी, रचना अच्छी लगी, जानकर खुशी हुई । हार्दिक आभार आपका। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 2, 2023 at 7:42am

आ. ऊषा जी,सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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