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तितली ( दोहे ) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

आ जाती हैं  तितलियाँ, होते ही नित भोर
सब को इनकी सादगी, खींचे अपनी ओर।१।
*
मधुवन में जब तितलियाँ, बहुत मचाती धूम
पीछे - पीछे  भागता,  हर्षित   बचपन  झूम।२।
*
फूलों से अठखेलियाँ, कलियों से कर बात
तन–मन में जादू  जगा, तितली  सोये रात।३।
*
मधुबन  में  जब  बैठते, बच्चे , वृद्ध, जवान
सबकी देखो तितलियाँ, हरती लुभा थकान।४।
*
छोटे -छोटे  पंख  से, रचकर  मृदु  संगीत
कलियों से तितली कहे, फूल बने हैं मीत।५।
*
नापे नभ  को  तितलियाँ, पहले  पंख पसार
हँस हँस फिर करतीं सदा, फूलों का आभार।६।
*
कहती चञ्चल नैन से, तितली मीठी बात
हँसने को आतुर तभी, कलियाँ सारी रात।७।
*
सुंदरता की  देवियाँ, परियों की पहचान
रंगविरंगी तितलियाँ, उपवन की हैं शान।८।
*
स्वर्गलोक से आ धरा, सुमनों की बन मीत
नवजीवन आधार रख, मधु संचय की रीत।९।
*
चूमे  काँटो  बीच  झट, चाहे  पलपल  फूल
चुभा न तितली को कभी, जग में कोई शूल।१०।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी " मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 5, 2023 at 7:04am

आ भाई समर जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।

साथ ही त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने के लिए भी आभार।

Comment by Samar kabeer on April 4, 2023 at 3:04pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब, अच्छे दोहे लिखे आपने, बधाई स्वीकार करें ।

'मधुवन में जब तितलियाँ, बहुत मचाती धूम'

इस पंक्ति में 'मचाती' की जगह "मचातीं" होना चाहिए,देखें ।

'सबकी देखो तितलियाँ, हरती लुभा थकान'

इस पंक्ति में 'हरती' की जगह "हरतीं" होना चाहिए, देखें ।

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