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रोला छंद .....

मात्र नहीं संयोग ,जीव का सुख-दुख  पाना ।
सीमित तन में श्वास,लौट के सब के  जाना ।
भोर-साँझ आभास, जगत  है  झूठी  आशा ।
आदि संग अवसान, ईश का अजब तमाशा ।

***********************************

समझो मन की बात, रात है सजनी  छोटी ।
आ जाओ कुछ पास, प्रेम की  सेकें  रोटी ।
यौवन के दिन चार, न  लौटे कभी जवानी ।
लिख डालें फिर आज,प्रेम की नई कहानी ।

सुशील सरना / 21-3-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on March 23, 2022 at 1:39pm
आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम सर सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है । सलमान त्रुटि इंगित करने का दिल से आभार । ये टंकण त्रुटि हुई है । अभी संशोधित करता हूँ सर । हार्दिक आभार सर
Comment by Sushil Sarna on March 23, 2022 at 1:36pm
आदरणीय चेतन प्रकाश जी सादर प्रणाम सृजन के भावों को मान देने व सुझाव देने का दिल से आभार ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 22, 2022 at 9:23pm

आदरणीय सुशील सरना जी, 

रोला छंद पर सधे हाथ हुआ प्रयास श्लाघनीय है. 

जय-जय 

एक बात :

बात स्त्रीलिंग होने से समझो मन की बात  शुद्ध चरण-पंक्ति होगी.

Comment by Chetan Prakash on March 22, 2022 at 4:55pm

पुनश्च  : हाँ  रोला  चौकड़ी है,  द्वय नही, भूल  सुधार कर रहा  हूँ । पहले रोला  का सम चरण  पुन: देखें जिस में कारक कर्म  के स्थान  पर  कदाचित  अधिकरण हो गया  है !

Comment by Chetan Prakash on March 22, 2022 at 4:43pm

 सुंदर  भाव पूर्ण  रोला द्वय छंद  की रचना  हुई  है, सरना साहब  !

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