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चूड़ी भरी कलाईयाँ, कँगना बसंत है - ग़ज़ल

एक ग़ज़ल 

 

चूड़ी भरी कलाईयाँ, कँगना बसंत है. 

सिंदूर भर के मांग में सजना बसंत है.

 

चारों तरफ घिरी रहें यादों की बदलियाँ, 

फिर उनके साथ रात में जगना बसंत है. 

 

बिखरी हुई हो चाँदनी नदिया के तीर पर,

फिर चाँद का चकोर को तकना बसंत है.

 

मौसम का क्या उसे तो बदलना है उम्र भर,

हर पल तुम्हारे साथ में रहना बसंत है.

 

पूछा ‘बसंत’ क्या है? तो राधा ने यह कहा,  

माला किशन के नाम की जपना बसंत है.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 27, 2021 at 8:50am

आदरणीय  Aazi Tamaam जी सादर नमस्कार ,

आपकी हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 27, 2021 at 8:50am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by Aazi Tamaam on April 27, 2021 at 8:03am

सादर प्रणाम आदरणीय बसंत जी सुंदर ग़ज़ल है

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2021 at 11:12am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है नयी रदीफ के साथ । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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