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उत्कर्षा का सारा शरीर थककर चूर हो चुका था कब नींद के आगोश में चली गयी पता ही नहीं चला ।

"हे ईश्वर ये किस पाप की सजा दी है तूने ये जन्म देकर जहाँ दो घड़ी का चैन नहीं ।"

"ऐसा क्यों कहती हो ,सतत कर्मशीलता ही तो भरी है मैंने तुम्हारी पेशियों में . क्या गलत किया?"

"प्रभु ! मैं भी कोई मशीन तो नहीं हूँ की ये सतत परिश्रमशीलता.."

"जानता हूँ ये सब सोचकर ही मैंने तुम्हें अष्टभुजा का प्रतिक रूप दिया है।"

"अष्टभुजा??? या कि...सारा श्रेय तो ..किंतु .."

"किन्तु क्या , देखो ना तुम्हें किसी के सहारे की जरुरत कहाँ पडी बल्कि तुम तो मजबूती से ऊपर उठी हो ।"

ये कैसा मजाक है,है ईश्वर !"

"सच कहा रहा हूँ इन दिनों के कठिन परिस्थितियों में तुमने माली से लेकर थाली(भोजन ) तक , व्यवसाय से लेकर व्यस्थापन तक सभी काम बड़ी खूबी से निभा रही हो ।"

"हां !! सो तो है मगर .."

"अगर मगर कुछ नहीं बस ! अब अपना मूल्यांकन तुम्हें खुद करना है ।"

उगते सूर्य का कोमल लाल बिम्ब उसकी खिड़की से अंदर झांक रहा था उसकी रेशमी किरणों ने उसमें फिर से शक्ति का संचार कर दिया ।
अब उसे पीछे मुड़कर देखने कि आवश्यकता ना थी न ही सहारे की ।

मौलिक,अप्रकाशित व अप्रसारित

 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 12, 2020 at 11:22am

आ. नयना जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on May 9, 2020 at 2:58pm

मुहतरमा नयना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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