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व्यावहारिकता (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (43)

"सुनते हो जी, मुझे तो ये वही लग रहा है जिसने...."

"हे भगवान ! ये तो वही है ! लेकिन इस वक़्त बहू उसके साथ कहां और क्यों जा रही है?

"तो इस क़ीमत पर सुदीप का प्रमोशन और उसकी बेटी की सरकारी नौकरी ?"

"हमारी दिल से सेवा करने वाली बहू हमारी पीठ पीछे....! तो ये है 'बी प्रेक्टिकल' कहने वाली 'एक्टिव' शिक्षिका !"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 6:09am
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देने हेतु सभी पाठकगण को तहे दिल से बहुत बहुत धन्यवाद।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 6:05am
मेरी इस रचना पर उपस्थित हो कर हौसला अफ़ज़ाई हेतु सभी पाठकगण को तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 16, 2015 at 4:48pm
मेरे ब्लोग पर उपस्थित हो कर रचना पर समय देकर प्रोत्साहित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय Vijay Nikore जी।
Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 2:11pm

"बी प्रैक्टीकल".... जीवन में कभी-कभी लोग प्राय: बहुत ज़्यादा "practical" हो जाते हैं। लघुकथा के लिए बधाई, आदरणीय उस्मानी जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 13, 2015 at 3:15pm
हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सतविंदर कुमार जी व आदरणीया नीता कसार जी मेरी हौसला अफज़ाई करने के लिए।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 13, 2015 at 2:51pm
आदरणीया Nita Kasar जी आदरणीय sheikh Shahzad Usmani जी इस बधाई के सही हकदार हैं।यह रचना उनकी है।
Comment by Nita Kasar on December 13, 2015 at 1:20pm
कम कह कर बहुत कुछ कह दिया है बधाई आद०सतविंदर जी ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 13, 2015 at 9:35am
लाज़वाब।हार्दिक बधाई आदरणीय शेख सहज़ाद जी।

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