For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नज़दीक़ियां-दूरियां - (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (39)

संयुक्त परिवार के मुखिया अपने कमरे में पधार चुके थे। पोता-पोती अपने-अपने कमरों में जाकर टीवी पर मनपसंद चैनल देखने लगे थे। बहुयें अपने-अपने कामों में व्यस्त थीं। एक बहू ने अपनी पारी संभालते हुए मुखिया की टेबल पर खाना-पानी परोसा और फिर वह भी अपने कमरे में टीवी पर मनपसंद धारावाहिक देखने लगी। मुखिया का भोजन जैसे-तैसे सम्पन्न हुआ। थाली शेष बचे भोजन सहित टेबल पर बहू के इंतज़ार में पड़ी रही। मुखिया ने एक धार्मिक पुस्तक उठायी, टीवी ओन किया, अपनी पसंद का न्यूज चैनल लगाया, कुर्सी पर बैठे तीन काम शुरू किए- पुस्तक पढ़ते हुए माला जपना और साथ ही तेज़ आवाज़ के साथ टीवी की न्यूज सुनना या देखना। कमाऊ बेटे काम पर गये थे, बेरोज़गार बेटे टीवी पर अपनी-अपनी पसंद के चैनलों से नाता जोड़े हुए थे या मोबाइलों से कहीं जुड़े हुए थे। घर के अन्दर-बाहर टेलीविजनों की ऊँची आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। संयुक्त परिवार में प्रतिदिन की तरह सब कुछ ठीक-ठाक था। नज़दीकियां भी थीं, दूरियां भी थीं। भावनाओं का, विचारों का सहज सम्प्रेषण नहीं था, सब के बीच एक अज़ीबो-ग़रीब फासला बरकरार था।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 823

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 5:16am
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देने हेतु सभी पाठकगण को तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 16, 2015 at 4:56pm
आपकी टिप्पणी पढ़कर मेरे सीखने के उत्क्रम की सफलता व मुझे असीम प्रोत्साहन हासिल हुआ है, तहे दिल बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2015 at 10:37pm

आदरणीय उस्मानी जी सटीक लघुकथा हुई है.लघुकथा अपने मर्म को शाब्दिक करने में सफल है. आपको बहुत बहुत बधाई 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 3, 2015 at 5:41pm
मेरे ब्लोग पर उपस्थित हो कर मेरी रचना को समय देने व प्रोत्साहन देने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया कान्ता राय जी, आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी, व आदरणीय सतविंदर कुमार जी।
Comment by pratibha pande on December 2, 2015 at 6:58pm

 आपने  भीड़ में बसे हुए अकेलों का क्या ख़ूब  चित्र खींच दिया है आदरणीय ,  बधाई आपको इस रचना पर ,  

Comment by kanta roy on December 2, 2015 at 6:38pm

आज के सन्दर्भ में प्रायः हर घर की यही रूप -रेखा है ये. नजदीकियां हो न हो , दूरियों ने प्राइवेसी के नाम पर अलग -अलग बंटे हुए कमरों में अपनी बढ़त खूब कायम किये हुए है। बहुत ही सटीक लघुकथा हुई है आदरणीय शहज़ाद जी। बधाई।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 2, 2015 at 4:30pm
वाहह्ह्ह्ह आदरणीय शेख साहब।आजकल सयुंक्त परिवार ऐसे ही हैं।सुंदर कथानक को चुनने एवम् सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 2, 2015 at 4:25pm
बहुत ख़ुशी हुई रचना पर आपकी उपस्थिति तथा कथा के मर्म समझने के साथ प्रोत्साहक टिप्पणियाँ पाकर।तहे दिल बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय नादिर ख़ान साहब, आदरणीय सुशील सरना जी व आदरणीय तेज वीर सिंह जी व आदरणीय सुनील वर्मा जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 2, 2015 at 4:22pm
बहुत कुछ अनकहा भी छोड़ा गया है ,उन शब्दों व वाक्यांशों में,जिन्हें आप इंगित कर रहे हैं उन्हें मिला कर ! सोचकर देखियेगा आदरणीय सुनील वर्मा जी, शायद मेरा प्रयास सफल हो जाये। रचना पर उपस्थित हो कर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सुनील वर्मा जी।
Comment by TEJ VEER SINGH on December 2, 2015 at 2:12pm

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी जी!आपने लघुकथा के माध्यम से आज के संयुक्त परिवार का बेहतरीन खाका खींचा है!घर में छोटे बडे अगर दस लोग हैं तो दस कमरों में दस टी. वी. चलेंगे,दस ए.सी. चलेंगे!अब वह समय नहीं रहा जब घर के हॉल में सारा परिवार एक साथ टी. वी. देखता था!अब तो लंच डिनर भी बैड रूम में ही होने लगे हैं!वह भी अकेले अकेले!बेहतरीन प्रस्तुति!पुनः बधाई!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
9 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
12 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
22 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"सादर अभिवादन।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service