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ग़ज़ल 212 – 212 – 212 – 212

212 – 212 – 212 – 212 ग़ज़ल

किस तरह आप से मैं कहूं प्यार है

जिक्र से ही हुआ दिल जो गुलज़ार है

आपका साथ है और क्या चाहिए

आप ही का बना दिल तलबगार है

जान लो तुम  मुहब्बत तो  है इक बला

इस से बचना बड़ा ही तो दुशवार है

रोग उसको अचानक ही समझो लगा

अब बना घूमता वो तो अख़बार है

जब हकीकत समझ आई तो देर थी

जो हुआ सो हुआ अब तो इकरार है

हुस्न ने लूट लाखों लिए सोच कर

हो गया इक नया जख्म सरकार है

मुनीश “तन्हा” नादौन 9882892447

मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on May 24, 2016 at 8:42pm

अवांछित ही, भी, तो जैसे शब्दों को मिसरों में न रहने दें. ये भर्ती के माने जाते हैं. ग़ज़ल में शब्द भर्ती के हुए तो ग़ज़ल कमज़ोर हो जाती है.  बाकी तो आपका प्रयास आश्वस्त कर रहा है, आदरणीय मुनीश भाई.

Comment by जयनित कुमार मेहता on May 18, 2016 at 10:34pm
आदरणीय मुनीश जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है। मगर, थोडा और समय आप देते तो शेर और प्रभावशाली हो सकते थे।

"जान लो तुम मुहब्बत तो है इक बला
इस से बचना बड़ा ही तो दुशवार है"

इसमें "बड़ा ही" और "दुश्वार" के बीच "ही" का प्रयोग खटक रहा है मुझे।
आदरणीय समर कबीर साहब, आपसे निवेदन है कि आप कृपया मेरी दुविधा दूर करें।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 18, 2016 at 4:49pm

इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय 

Comment by Samar kabeer on May 17, 2016 at 6:51pm
जनाब मुनीश'तन्हा'साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Sushil Sarna on May 17, 2016 at 3:40pm

आदरणीय सुंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 17, 2016 at 1:00pm
आ.मुनीश सरजी लय से भरी अच्छी ग़ज़ल हुयी है,हार्दिक बधाई।

जान लो तुम ये मुहब्बत है इक बला
इस से बचना बड़ा ही तो दुशवार है....ये शेर मेरे ख्याल से बेबहर हो रहा है कृपया देख लें।

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