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बड़ी क्षणिकायें -1--एक प्रयोग - डा० विजय शंकर

इतना तो
सब जानते हैं कि
एक रेखा को बिना काटे
छोटा करने का आसान तरीका यह है
कि उसके पास उससे बड़ी एक रेखा खींच दें ॥
आप बैठे बैठे बड़े बने रहे इसका आसान
तरीका यह है कि आप अपने पास
हमेशा अपने से छोटे लोग रखें ,
गलती से भी किसी बड़े
के सामने न आयें ॥
* * * * * * * * * * *
जीवन तो चलता है ,
करुणा , प्रेम ,दया से ,
पर हमनें उन्हें बनाया है ,
पासंगे बट्खरे जीवन के ,
सब नाप-तौल के चलाना है,
कहाँ कितनी दया दिखानी है,
कहाँ कितना-कैसा प्रेम दर्शाना है ,
मजबूरी हो तो करुणा भी बरसाना है ,
सब मूलयवान हैं सबका मूल्य चुकाना है ,
करुणा ,प्रेम,दया , दे दो, जिसका जो बनता है ,
संतुलन बना के रखो , रेट देख लो जो बनता है ॥

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
कोई दौड़ रहा है दो रोटियाँ पचाने के लिए
कोई दौड़ रहा है दो रोटी पाने के लिए
रोटी अपनी कीमत खूब जानती है ,
मुफ्त में तो नहीं ही मिलती है ,
मुफ्त में मिल भी जाये
तो पचाने के लिए
मेहनत मांगती है ,
उसी के रूप में
कीमत मांगती है ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by kanta roy on October 8, 2015 at 12:53pm

आपकी तीनो क्षणिकायें बहुत शोर करती है।  बेचैन करती है ये जीवन के घाट जोड़ को।  बड़े होने के  हिसाब का हिसाब  बड़ा ही बड़प्पन लिए हुए है जहां ,  वहीँ  दूसरी  क्षणिका  जीवन को नाप-तौल के चलाना , बड़ी  ही तीखी कटाक्ष हुआ  है। दो रोटियाँ पचाने के लिए किसी का दौड़ने   को क्या कहें ! बहुत खूब लेखकीय कर्म  है यहां भी आपका।  बधाई आपको आदरणीय विजय जी इस अनुपम रचनाओं के लिए।  सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 2, 2014 at 2:59pm
आदरणीय अखिलेश कृष्ण जी , आपको क्षणिकायें पसंद आईं , उन्हें सार्थकता मिली . आपकी बधाई के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर .
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 2, 2014 at 1:12pm

आदरणीय विजयशंकर भाई,

बड़े ही सटीक , सुंदर ,  सार्थक ,सामयिक क्षणिकाएँ , हार्दिक बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 1, 2014 at 10:50pm

आदरणीय रमेश कुमार चौहान जी, प्रसंशा और  बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।  

Comment by रमेश कुमार चौहान on October 1, 2014 at 7:26pm

सुंदर कटाक्ष, सफल प्रयास, बधाई आदरणीय

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 30, 2014 at 3:37pm

आपकी बधाई के लिए ह्रदय से  धन्यवाद।  आदरणीय महिमा श्री जी , आपकी साहित्यिक पसंद सराहनीय है , सादर  

Comment by MAHIMA SHREE on September 30, 2014 at 8:20am

रोटी अपनी कीमत खूब जानती है ,
मुफ्त में तो नहीं ही मिलती है ,
मुफ्त में मिल भी जाये
तो पचाने के लिए
मेहनत मांगती है ,
उसी के रूप में
कीमत मांगती है ॥.... तीनो  क्षणिकाएँ अपने आप में परिपूर्ण है .जीवन की तल्ख़ सच्चाई का बयाँ है हार्दिक बधाई स्वीकार करे आदरणीय 

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 29, 2014 at 8:11pm

आदरणीय डॉo पवन कुमार  जी , आपको क्षणिकाएँ  अच्छी लगी , अच्छा लगा , आपकी बधाई  बहुत बहुत  धन्यवाद।  

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 29, 2014 at 8:09pm

आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा जी , आपको रचना अच्छी लगी ख़ुशी हुयी , आपकी बधाई  लिए ह्रदय से धन्यवाद।  

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 29, 2014 at 7:03pm
आदरणीय खुर्शीद जी, आपकी ह्रदय से प्रकट की गयी शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से बहुत बहुत धन्यवाद .

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