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मास्क वाले चेहरे

मैं अक्सर निकल जाता हूँ भीडभाड गलियों से

रौशनी से जगमग दुकाने मुझे परेशान करती हैं

मुझे परेशां करती है उन लोगों की बकबक

जो बोलना नहीं जानते

 

मै भीड़ नहीं बनना चाहता बाज़ार का

मैं ग्लैमर का चापलूस भी नहीं बनना चाहता

मुझे पसंद नहीं विस्फोटक ठहाके

मै दूर रहता हूँ पहले से तय फैसलों से

 

क्योंकि एकदिन गुजरा था मै भी लोगों के चहेते रास्ते से

और यह देखकर ठगा रह गया की

मेरा पसंदीदा व्यक्ति बदल चूका था

बदल चुकी थी उसकी…

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Added by Akhileshwar Pandey on February 27, 2011 at 1:28am — 3 Comments

ghazal

सपने सब रंगीं ऊंची दूकानों में 
सच्चाई बसती है फीके पकवानों में
 
हम ने तो समझा था घर के ही हम भी 
गिनती करवा बैठे लेकिन मेहमानों में
 
बस्ती को साँपों ने सूंघा हो जैसे कि
शंखनाद जारी है लेकिन शमशानों में
 
ज़न्नत कि बातें अब सोचें तो क्या सोचें
रोटी तक शामिल है अपने अरमानों में
 
अपना ये होना भी होने में होना है
'होने' को गिनते वो अपने…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 26, 2011 at 10:52pm — 3 Comments

आप तो आप थे ........."

आप तो आप थे .........



है दिए जो जख्म आपने दिल को,

भर दे उसे कोई किसी में है ओ प्रीत कहाँ,

बहते मेरे लावारिस अश्को को कोई थामले,

 एक तेरे सिवा दूसरा ओ मन्मित कहाँ, 

आप ने  किये जो घोर अँधेरा मेरे जीवन में,

आक़े अब कोई रोशन करे  है यैसी तक़दीर कहाँ,

जब ह्रदय की आशाएं बंद हो चली…

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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on February 26, 2011 at 7:00pm — 2 Comments

प्रीतम की गली.........

प्रीतम की गली.........

हर किसी के ज़िन्दगी में बसता है किसी के ख्वाबो का कारवां,

दूरियाँ मित जाती है मीट जाते है सारे शिकवे गीले,

हर किसी के धड़कन में होती है किसी की मुहब्बत जवां,

चाहतो का सैलाब लिए जब दो बदन हो एक मीले,

अपने प्रियवर के ख्वाब,को रोशन करे ऐ दिल की समां

उड़ चला जाता है ये मन इस दुनिया से दूर बहुत,

जहां प्रिय मिलन के मदहोश…

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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on February 26, 2011 at 6:30pm — 2 Comments

कविता :- छोड़ दूं सच साथ तेरा

कविता :-  छोड़ दूं सच साथ तेरा

हर अनुभव हर चोट के बाद

अक्सर ऐसा सोचता हूँ

छोड़ दूं सच साथ तेरा

चल पडूँ ज़माने की राह

जो चिकनी है और दूर  तक जाती है

जिस राह पर चलकर

किसी को शायद नहीं रहेगी

शिकायत मुझसे

अच्छा…

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Added by Abhinav Arun on February 26, 2011 at 1:30pm — 11 Comments

कालेधन के चक्कर में बुरे फंसे योगगुरू

विदेशों में जमा काला ध न को वापस लाने के लिए देश भर में शंखनाद कर भारत स्वाभिमान यात्रा निकालने वाले योग गुरू अर्थात् बाबा… Continue

Added by rajendra kumar on February 25, 2011 at 11:00pm — 1 Comment

एक ग़ज़ल

अब दागों की ही रवायत हो गई
ज़िन्दगी गोया तवायफ हो गई
 
अब वफ़ा ही शूल सी चुभने लगी 
आप की जब से इनायत हो गई 
 
है मुहब्बत कह दिया चौराहे पर 
जाने किस किस से अदावत हो गई
 
जो हुए गाफिल तो भुगतेंगे जनाब 
आप को कैसे शिकायत हो…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 25, 2011 at 10:00pm — 3 Comments

गज़ल : झूठ से इसको नफरत सी है

गज़ल : झूठ से इसको नफरत सी है

झूठ से इसको नफरत सी है सच्चाई को प्यार कहे ,

मेरा दिल तो जब भी बोले…

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Added by Abhinav Arun on February 25, 2011 at 9:00pm — 5 Comments

लिफ़ाफ़ा

नाम नहीं कोई पता नहीं है....

कोई भी पहचान नहीं है....
जाने किस एक शख्स ने अपने,

सहमें सहमें जज्बातों को,
बंद लिफाफे में रखकर के,

मेरे नाम से लिख भेजा है....
काश के ऐसा कोई लिफाफा

आज से पंद्रह बरसों पहले,
तुमने मुझको भेजा होता...

Added by Sudhir Sharma on February 24, 2011 at 11:30pm — 1 Comment

मौत सच्ची मनमित

मौत सच्ची मनमित

सुनहरे ख्वाब जो दिखाए जिंदगी ने,
है उसका क्या भरोसा  साथ कब तलक निभाएगी !!


है किये जिंदगी ने वादे बहुत,


मौत का वादा है पक्का एक दिन जरुर  आएगी !!



राहे लम्बी…
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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on February 24, 2011 at 9:38am — 1 Comment

‘शबरी महोत्सव’ पर लगा ग्रहण

छत्तीसगढ़ राज्य में टेम्पल सिटी के नाम से विख्यात शिवरीनारायण में माघी मेला के दौरान आयोजित होने वाले शबरी महोत्सव पर ग्रहण लग गया है। राज्य सरकार और संस्कृति विभाग की उदासीनता के कारण आयोजन समिति को बजट नहीं मिलने से पिछले तीन वर्षो से यह महोत्सव नहीं हो पा रहा है।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद राज्य सरकार ने शिवरीनारायण में हर वर्ष माघी पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाले मेले…

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Added by rajendra kumar on February 24, 2011 at 9:30am — 1 Comment

तुम्हारी याद में.........

तुम्हारी याद में.........

अनमोल मोहब्बत जब रुसवा होती है

उर के बेदर्द खौफ से जिंदगी जुदा होती है

मौत से भी गहरी जिंदगी हो जाती है 

जब वफ़ा बेवफा हो जाती है 

दिशा देना चाहता हूँ आज मै जिंदगी को, 

भूला नहीं पाता हूँ कुछ की तेरी बंदगी को,

इस पल याद करता हूँ मै बीते उस पल को,

आपके आस्तित्व से धड़कते हुए उस दिल को,
तुम मुझमे आज भी ज़िंदा हो छोड़ तुम मुझे दिए तो क्या,
जिंदगी रोज़ खफा होती है नहीं बस आती मौत तो करे…
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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on February 24, 2011 at 9:30am — 1 Comment

कुत्ते हैं आवाम का...

(आज देश की हालत ये है कि हर नुक्कड़ पर के आवारा दोपाये अपने आपको नेता समझ बैठे हैं, देश के शीर्ष भवन  में बैठ ये विभिन्न सुरों में भौंकते हैं |  इस तस्वीर को देश समझें और टूटते झोपडी को देश का संसद...

इस कविता/व्यंग्य का भाव दोपायों के लिए है | चौपायों से क्षमाप्रार्थी हूँ उनकी इस…
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Added by Shashi Ranjan Mishra on February 24, 2011 at 8:50am — No Comments

एक गीत अनोखा लायी हूँ...

 

HIV POSITVE KIDS 

 

जब जी चाहे तब गा लेना ,एक गीत अनोखा  लायी हूँ..

हर भाव को क्षण में जी लेना ,संगीत अनोखा लायी हूँ..
जो पीर से व्याकुल कर देगा वो दर्द अनोखा लायी…
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Added by Lata R.Ojha on February 24, 2011 at 2:33am — 19 Comments

क्या पाया तुमने

वो झूठी झूठी सी खुशी

वो बनावती सी हँसी

वो जबरदस्ती का रोना

कलाकारी है वो दुखी होना

अगर तुम यही कर सके

तो क्या पाया तुमने



वो मोहोताज संतुष्टि

वो सोच कर चुप रहना

वो लिखा हुआ सा कहना

वो भाव के विपरीत बहना

अगर ऐसे रुके हो तुम 

तो क्या पाया तुमने



वो दूसरों से पूछना खासियत अपनी

वो अपनी सफलता पर यकीन ना होना

वो मजाक जो हँसी के इन्तजार में रहता

वो शोक जो है अब जुबान से बहता

अगर ऐसे उलझे हो तुम

तो क्या पाया… Continue

Added by Bhasker Agrawal on February 23, 2011 at 7:00pm — 2 Comments

कभी भी तम नहीं होता

रगों में गम नहीं होता, ये चेहरा नम नहीं होता;
तड़पती झील के आँचल में पानी कम नहीं होता;
जो बजती रागिनी थी उन हवाओं कि दिशाओं से;
अभी भी सत्य ही होता, महज़ ये भ्रम नहीं होता;
ज़रा सा उस समय मुहं मोड़ कर जो तुम नहीं मुड़ते;
विवशताओं की घाटी में कभी भी तम नहीं होता.

Added by neeraj tripathi on February 23, 2011 at 3:40pm — 2 Comments

दोहा सलिला: देख दुर्दशा देश की संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला: 

 

देख दुर्दशा देश की

 

संजीव 'सलिल'

*

देख दुर्दशा देश की, चले गये जो दूर.

उनसे केवल यह कहूँ, आँखें रहते सूर..



देश छोड़ वे भी गये, जिन्हें प्रगति की चाह.

वाह मिली उनको बहुत, फिर भी भरते आह..



वसुधा जिन्हें कुटुंब…

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Added by sanjiv verma 'salil' on February 23, 2011 at 12:28pm — 3 Comments

ek ghazal

 
खोट के सिक्के चलाये जा रहे है 
लोग बन्दर से नचाये जा रहे है
 
आसमां में सूर्य शायद मर गया है
मोमबत्ती को जलाये जा रहे है
 
देखिये तांडव यहाँ पर हो रहा है
रामधुन क्यों गुनगुनाये जा रहे है
 
जो पिघल कर मोम से बहने लगे है
लोग वो काबिल  बताये जा रहे है
 
आप को वो स्वप्नजीवी मानते है
स्वप्न अब रंगीन लाये जा रहे…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 22, 2011 at 10:18pm — 1 Comment

नत्था जैसी हो गई छत्तीसगढ़ के अन्नदाताओं की हालत

छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में अगर अन्नदाता आत्महत्या करने लगे तो, सोचा जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है। छत्तीसगढ़ जहां की अधिकांश आबादी कृषि कार्य पर निर्भर है और इस कृषि के काम को करने वाला टाटा या अम्बानी जैसे उद्योगपति नहीं बल्कि, एक आम किसान है, जो दिन रात एक करके फसल को तैयार करता है, उसे आज सरकारी मदद के आभाव में कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने के लिए… Continue

Added by rajendra kumar on February 22, 2011 at 8:30pm — No Comments

कांग्रेसी नेताओं में छिड़ी आपसी जंग

छत्तीसगढ़ में संजारी बालोद उपचुना व में मिली करारी हार के बाद कांग्रेसी नेताओं के बीच आपसी जंग तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष धनेंद्र साहू पर वार करते हुए बालोद प्रचार में नहीं बुलाने की बात दोहराई है। पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रदेश प्रभारी वी. नारायण सामी को पांच बिन्दुओं पर पत्र भेजकर सफाई दी है। इसमें उन्होंने चुनाव प्रचार को लेकर कांग्रेस… Continue

Added by rajendra kumar on February 22, 2011 at 9:30am — 1 Comment

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