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ख्वाबों के दिन

ख्वाबों के दिन

ख्वाबों के दिन

कब मन को तड़पाते नहीं !

सुबह की पहली किरण

जब खिड़की पर थाप देती,

चिड़ियों की चहचहाहट से

जब खुलती हैं आँखें -

ज़िंदगी एक नयी करवट लेती हुई

बिस्तर की सलवटों पर

सिकुड़ी सिमटी सी , क्यों

तटस्थ हो जाती है ?

वक़्त का हर पल

एक सुनहरा ख्वाब दिखलाता है.

कुछ सपनों के दिन,

कुछ अधूरी रातें,

खुले नैनों के द्वार से

कहाँ दौड़े चले जाते है ?

एक कसमसाहट सी होती है -

अंगड़ाई…

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Added by coontee mukerji on June 3, 2013 at 10:21pm — 11 Comments

अध्याय

अध्याय

 

एक छुवन से मेरा रिश्ता था,

वो पल,…

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Added by yatindra pandey on June 3, 2013 at 9:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल - "सितारे देखिये जब शब सियाह हो जाए"

बह्रे मुज़ारे मुसम्मन मुरक़्क़ब मक़्बूज़ मख़्बून महज़ूफ़ो मक़्तुअ



1212/ 1122/ 1212/ 22

***********************

हमें अज़ीज़ मुजद्दिद की राह हो जाए;

नज़र में शैख़ की गर हो गुनाह हो जाए;…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on June 3, 2013 at 8:30pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आईना - अरुण कुमार निगम

आईना देख कर

हो गई बावरी

नैन रतनार से

देह भी मरमरी ||…



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Added by अरुण कुमार निगम on June 3, 2013 at 8:00pm — 12 Comments

"वापस न जाइये"

दिल के करीब आइये कुछ तो बताइए
यूँ आग को सुलगा के भला क्यों बुझाइए ?

दुनिया के डर से आप को तनहा न छोडिये
बस आँख बंद कीजिए मुझमे समाइये

रोयी है बहुत आँख मुकम्मल ये जिंदगी
पलकों पे मेरी फिर नए सपने सजाइए

जीवन के ओर छोर का कुछ भी पता नही
यूँ जिंदगी में आइये वापस न जाइए

मुमकिन है थोड़ी गलतियाँ होती रही “ऋषी”
खुद को न ऐसे कोसिए न ही सताइए

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Added by Anurag Singh "rishi" on June 3, 2013 at 7:35pm — 7 Comments

हे मन........

हे मन.....

तोङ दे सारे बन्धन.

तोङ दे सारे घमन्ड,छोङ दे मद़ पाना हॆ तुझे अमरत्व का पद

चलना हॆ तुझे सदॆव. सतत

रहना हॆ सदा संघर्षमय प्रयासरत.

अगर तुम्हे बाँधगया कोई मायाजाल

तो कॆसे पाओगे वह शिखर विशाल

जिसके लिये तुम हो सदा से अधीर

फिर बार बार नही मिलेगा तुम्हे नश्वर शरीर

चलते ही रहना…

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Added by pankaj singh on June 3, 2013 at 7:30pm — 2 Comments

चुल्लू भर पानी ( लघु कथा )

 चुल्लू भर पानी

 

चिलचिलाती धूप मे भी तेरह –चौदह वर्षीय किशोर सिर पर मलबे से भरी टोकरी उठाए बहुमंज़िली इमारत से नीचे उतर रहा था । उतरते उतरते उसे चक्कर आने लगा उसने सुबह से कुछ खाया नहीं था । उसके घर मे कोई बनाने वाला नहीं था , उसकी माँ बहुत बीमार थी उसके लिए दवा का बंदोबस्त जो करना था उसी के वास्ते वह काम करने आया था । चक्कर आने पर वह वहीं सीढियों पर दीवाल से सिर टिका कर…

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Added by annapurna bajpai on June 3, 2013 at 6:30pm — 5 Comments

अनोखा रिश्ता सास का

तपते रेगिस्तान मे पानी की बूंद जैसी,

उफनती नदी के बीच कुशल खिवैया सी ।

ससुराल मे तरसती बहू के लिए माँ सी ,

तमाम गलतियों के बीच समाधान सी ।

 …

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Added by annapurna bajpai on June 3, 2013 at 4:30pm — 11 Comments

शक्ति है मात्र नारी (महाभुजंगप्रयात सवैया)

विधान : महभुजंगप्रयात सवैया - यगण (।ऽऽ) X 8

नहीं पुत्रियाँ क्या रहीं पुत्र जैसी उठा चिन्तनों में यही प्रश्न भारी
यही सोचते रात्रि बीती हमारी समाधान पाया नहीं बुद्धि हारी
पढ़ा सत्य है पुत्रियाँ हैं नहीं पुत्र जैसी कभी भी न होतीं विकारी
न मारो इन्हें गर्भ में पुत्र से श्रेष्ठ हैं मान लो शक्ति है मात्र नारी
*******************************


डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 3, 2013 at 3:30pm — 13 Comments

लघु कथा - सस्ता घी

लैब से स्टूडेंट जा चुके थे . मनोज वर्मा प्रैक्टिकल रिकॉर्ड चेक कर रहा था . 

‘अरे जयराम , यार तुम्हारे यहाँ गाय-भैस तो होगी ही , बढ़िया शुद्ध घी का इंतजान करो यार’ (मनोज मुस्कुराता हुआ अपने लैब सहायक से बोला)

‘है तो साहब , लेकिन घरही में पूर नाय पड़त’ .

‘अरे जुगाड़ करो यार कही से , पैसे की कोई बात नहीं है’ (जोर देते हुए मनोज बोला )

‘उ तो ठीक है साहब , देखित है’.

(कुछ सेकंड के मौन के बाद)…

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Added by DRx Ravi Verma on June 3, 2013 at 2:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल

वह शौक से मेरी जान लेगा,
हर कदम पे मेरा इम्तेहान लेगा,


पिघलेगा एक दिन मोम की तरह,
वह संगदिल मुझे जब पहचान लेगा,

गिर ही जायेँगी दीवारेँ नफरतोँ की,
मोहब्बत से काम जब इंसान लेगा,

मिलेगी 'आबिद' यहां मंजिल उसी को,
हौसलोँ से अपने जो भी उड़ान लेगा!

(मौलिक व अप्रकाशित)

_______आबिद

Added by Abid ali mansoori on June 3, 2013 at 1:30pm — 11 Comments

(नई कविता) अतुकान्त

(नई कविता) अतुकान्त

================

तपतॆ हुयॆ,

रॆत कॆ भूगॊल मॆं,

पढ़ रही हूं

तुम्हारी यादॊं का,

इतिहास,

और,,

गढ़ रही हूँ,

उम्मीदॊं कॆ,

विज्ञान की,

नई प्रयॊगशाला,

समाज-शास्त्र कॆ,

दु:सह नियम,

जकड़ॆ हुयॆ हैं,

मर्यादाऒं की बॆड़ियाँ,

फिर भी,,,,

विश्वास का गणित,

कह रहा है,

एक दिन,…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on June 3, 2013 at 9:30am — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आँखों देखी – 3 : अंटार्कटिका.. उफ़ ! वह रात

उफ़ ! वह रात... आँखों देखी – 3

भूमिका : मैं इससे पहले आपको बता चुका हूँ कि भारत के अंटार्कटिका अभियान की सूचना कब और क्यों हुई. अंटार्कटिका का सूक्ष्म परिचय भी मैंने आपको दिया है लेकिन यह एक ऐसा विशाल विषय है कि इस पर किसी भी आलोचना या विचार विमर्श का अंत मुझे नहीं दिखता.

आप सब जानते हैं कि अंटार्कटिका एक महाद्वीप है जिसको घेरकर दक्षिण महासागर (Southern Ocean ) का रहस्यमय साम्राज्य है. यह महाद्वीप पृथ्वी के दक्षिण छोर पर होने के कारण यहाँ दिन-रात का चक्र कुछ दूसरे ही नियम से चलता…

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Added by sharadindu mukerji on June 3, 2013 at 1:30am — 6 Comments

ग़ज़ल/ चुभती रही

आदरणीया कल्पना जी के सुझाव के अनुसार रचना में सुधार का प्रयास किया है। कृपया आप सुधी जन इसे एक बार फिर देखने का कष्ट करें।

2122, 2122, 2122, 212 

चांदनी भी धूप जैसी रात भर चुभती रही

याद जलती सी शमा बन देह में घुलती रही

 

सह रहे थे तीर कितने वक्त से लड़ते…

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Added by बृजेश नीरज on June 2, 2013 at 7:30pm — 54 Comments

गंजे का दर्द (घनाक्षरी )

बाल सभी झड़ गये,बुढ्ढा अब  दिखता हूँ !

हमउम्र औरतें भी,चाचा कह देती हैं !!

पत्नी भी मारे है ताना,भाग्य मेरे फूट गये !

कभी कभी वो भी मुझे,बुढ्ढा कह देती है !!



अपने ही जब कभी,अपना मज़ाक ले लें  !

किससे कहूँ कितनी,पीड़ा मुझे होती है…

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Added by ram shiromani pathak on June 2, 2013 at 1:30pm — 25 Comments

हे पथिक

एक अँधेरी गली

सुनसान

वीरान

पथिक व्यथित

हलाकान

 

न कोई

हलचल

न कोई

आवाज

न साज

पथिक व्यथित

उदास

 

गहन अँधेरा

कालिमा का बसेरा

ह्रदय के स्पंदन

स्वर में बदल रहे हैं

चीत्कार

स्वयं की

बस स्वयं की

 

वर्षों सुनसान

गली में

चलते चलते

स्वयं से

परिचर्चा करते करते

कभी थाम लेता था

हाथ

स्वयं का दिलासा…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2013 at 12:00pm — 21 Comments

विश्व में आका हमारे//गजल//

 २१२२/२१२२/२१२२/२१२

 

वे सुना है चाँद पर बस्ती बसाना चाहते।

विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते।

 

लात सीनों पर जनों के, रख चढ़े  हैं सीढ़ियाँ,

शीश पर अब पाँव रख, आकाश पाना चाहते।

 

भर लिए गोदाम लेकिन, पेट भरता ही नहीं,

दीन-दुखियों के निवाले, बेच खाना चाहते।

 

बाँटते वैसाखियाँ, जन-जन को पहले कर अपंग,

दर्द देकर बेरहम, मरहम लगाना चाहते।

 

खूब दोहन कर निचोड़ा, उर्वरा भू को प्रथम,   

अब हलक की…

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Added by कल्पना रामानी on June 2, 2013 at 12:00pm — 27 Comments

शहर की तंग गलियों से

शहर की  तंग  गलियों से निकलना चाहती हूँ,

मैं अपने गाँव के अंचल में  जाना चाहती  हूँ .



वो मौसम आम के ,डालियों से झूलना मेरा,

उन्हीं शाखों पे फिर झूम जाना चाहती हूँ .



बहुत ही याद आती हैं मेरे गांव की सखियाँ,

उन्हीं सखियों के संग खिलखिलाना चाहती हूँ .



बड़ी रफ़्तार वाली है शहर की ज़िन्दगी लेकिन,

मैं फुर्सत के वे लम्हे फिर चुराना चाहती हूँ .



चढ़ती ही जाऊं आस्मां की सीढ़ियाँ लेकिन,

जमीं पे ही अपना घर बसाना चाहती हूँ .…



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Added by sanju shabdita on June 2, 2013 at 11:30am — 13 Comments

माँ चुप रही (लघु कथा )

मेरे वास्तविक भारतीय मध्यम वर्गीय परिवार में माता पिता और पांच भाई हैं . छोटे तीन भाई जो तिडुआ हैं, मुझसे ५ साल छोटे .

रौशन और जलज बी. टेक कर रहे है और पवन बी. ए. अंतिम वर्ष में है ..

होली के बहाने सब इकट्ठा हैं.

माँ (पवन से) – कल तुम फिर खा पी कर आये थे . खाना ख़राब हुआ . पहले बता नहीं पाते हो की ढूस के आओगे ?

पवन कुछ नहीं बोला ..

माँ (लगभग मुझे सुनाते हुए )- कल गेट नहीं खोल पा रहा था . पता नहीं ये लड़के क्या करेंगे ? रोज पार्टी , रोज दारू .

पवन कुछ…

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Added by DRx Ravi Verma on June 2, 2013 at 11:00am — 6 Comments

ग़ज़ल : जीतने तक उड़ान जिंदा रख

बहर : २१२२ १२१२ २२

----------------------------------

बाजुओं की थकान जिंदा रख

जीतने तक उड़ान जिंदा रख

 

आँधियाँ डर के लौट जाएँगीं

है जो खुद पे गुमान जिंदा रख

 

तेरा बचपन ही मर न जाय कहीं

वो पुराना मकान जिंदा रख

 

बेज़बानों से कुछ तो सीख मियाँ

तू भी अपनी ज़बान जिंदा रख

 

नोट चलता हो प्यार का भी जहाँ

एक ऐसी दुकान जिंदा रख

 

जान तुझमें ये डाल देंगे कभी

नाक, आँखें व कान…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 1, 2013 at 11:32pm — 29 Comments

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