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दिल के करीब आइये कुछ तो बताइए
यूँ आग को सुलगा के भला क्यों बुझाइए ?

दुनिया के डर से आप को तनहा न छोडिये
बस आँख बंद कीजिए मुझमे समाइये

रोयी है बहुत आँख मुकम्मल ये जिंदगी
पलकों पे मेरी फिर नए सपने सजाइए

जीवन के ओर छोर का कुछ भी पता नही
यूँ जिंदगी में आइये वापस न जाइए

मुमकिन है थोड़ी गलतियाँ होती रही “ऋषी”
खुद को न ऐसे कोसिए न ही सताइए

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

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Comment

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Comment by Anurag Singh "rishi" on June 9, 2013 at 2:10pm

आप सभी को सादर नमन मै गज़ल का बहुत अधिक तकनीकी ज्ञान नही रखता बस गाकर धुन और ले में लिखने कि कोशिस करता हूँ त्रुटियाँ हुई तो क्षमा प्रार्थी हूँ
आशा है  आप सभी का स्नेह और वात्सल्य ऐसे ही मिलता रहेगा सर
सादर
अनुराग सिंह "ऋषी"

Comment by वीनस केसरी on June 6, 2013 at 12:54am

अच्छी ग़ज़ल हुई है भाई जी
बाकी तो सब चकाचक लगा, कठिन बहर है तो लयात्मक रूप से निभाने की कोशिश में चूक हो जाती है ...
दो मिसरे लय से भटक रहे हैं और एक मिसरे में न को दीर्ध मात्रिक लेने से थोडा अटपटा सा लगता है

दुरुस्त कर लें तो अच्छी ग़ज़ल हो जायेगी
बधाई एवं शुभकामनाएं


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 6, 2013 at 12:04am

आप मिसरों का वज़्न लीखिये और फिर देखिये

शुभ-शुभ

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2013 at 5:58pm

प्रस्तुति के लिए बधाई 

Comment by Anurag Singh "rishi" on June 4, 2013 at 8:52am

आभार आप सभी का मेरा सादर नमन स्वीकारें 
सधन्यवाद 

Comment by वेदिका on June 4, 2013 at 12:48am

अच्छी कविता है ....थोडा समय और देके और भी प्रभावोत्पादकता उत्पन्न की जा सकती है 

प्रयास के लिए बधाई आदरणीय अनुराग ऋषि जी! 
Comment by Yogendra Singh on June 3, 2013 at 10:42pm

बहुत बहुत सुंदर 

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