अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध ।
मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।।
प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार ।
काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।।
अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद ।
शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।।
अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात ।
कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।
बातें बीती रात की, कहते आए लाज ।
लाख छुपाया खुल गए, सुर्ख नयन से राज ।।
सुशील…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 8, 2026 at 9:00pm — 2 Comments
२२१/२१२१/१२२१/२१२
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घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये
उघड़े शरीर आप ही सम्मान हो गये।१।
*
गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली
उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२।
*
घर में बहार नल से जो आयी गरीब के
पनघट हर एक गाँव के वीरान हो गये।३।
*
भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर
सारे ही फर्ज, कौम को अहसान हो गये।४।
*
हाथों अपढ़ के देखते शासन की डोर है
पढ़ लिख गये जो देश में दरवान हो…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 7, 2026 at 6:23am — No Comments
दोहा पंचक. . . . . दिल
रात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।
फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन ।।
उल्फत की दहलीज पर, दिल बैठा हैरान ।
सोच रहा वह इश्क में, क्या पाया नादान ।।
आँसू आहें हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।
नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।
ख्वाबों सा हर पल लगे, उन बांहों में यार ।
जिस्मानी जन्नत मिली, दिल को मिला करार ।।
कैसी ख्वाहिश कर रहा , पागल दिल नादान ।
आसमान सम चाँद पर, खो बैठा ईमान ।।
सुशील…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 4, 2026 at 8:30pm — No Comments
दोहा सप्तक. . . . नैन
नैन द्वन्द्व में नैन ही, गए नैन से हार ।
नैनों को मीठी लगे, नैनों से तकरार ।।
नैनों की तकरार है, बड़ा अजब आनन्द ।
हृदय पृष्ठ पर प्रेम के, अंकित होते छन्द ।।
नैनों के संवाद की, होती मोहक नाद ।
नैन सुने बस नैन के, अनबोले संवाद ।।
नैनों की होती सदा, मौन सुरों में बात ।
नैनों की मनुहार में, बीते सारी रात ।।
बड़ा मनोरम नैन का, होता है संसार ।
नैनों के इसरार को, नैन करें स्वीकार ।।
नैन उदधि में प्रेम का, जब…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 3, 2026 at 8:02pm — No Comments
2122 1212 22
आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में
क्या से क्या हो गए महब्बत में
मैं ख़यालों में आ गया उस की
हो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में
मुझ से मुझ ही को दूर करने को
आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में
तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं
चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में
चाट कर के अफीम मज़हब की
मरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में
ए ग़रीबी है शुक्रिया तेरा
जो भी सीखा है सीखा ग़ुर्बत…
ContinueAdded by Jaihind Raipuri on February 3, 2026 at 10:30am — 6 Comments
२१२/२१२/२१२/२१२
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अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमी
एक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।
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आदमीयत जहाँ खूब महफूज हो
एक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।
*
दूर नफ़रत का जंजाल करले अगर
दो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।
*
खींचने में लगे पाँव अपने ही अब
व्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४।
*
तब मनुज देवता हो गया जान लो
लोक मन में अगर कढ़ सके आदमी।५।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2026 at 11:24pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . रिश्ते
मिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।
निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।
लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।
वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।
पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में संबंध ।
आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।
वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।
संबंधों को लीलती , धन की झूठी शान ।।
रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।
अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।
सुशील…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 1, 2026 at 4:00pm — 2 Comments
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