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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

सवालों का पंछी सताता बहुत है-गीत

मुझे रात भर ये भगाता बहुत है।सवालों का पंछी सताता बहुत है।।कभी भूख से बिलबिलाता ये आएकभी आँख पानी भरी ले के आएकभी खूँ से लथपथ लुटी आबरू बनतो आये कभी मेनका खूबरू बनये धड़कन को मेरी थकाता बहुत हैसवालों का पंछी सताता बहुत है।।1।।कभी युद्ध की खुद वकालत करे येअचानक शहीदों की बेवा बने येकभी गर्भ अनचाहा कचरे में बनकरमिले है कभी भ्रूण कन्या का बनकरनिगाहों को मेरी रुलाता बहुत हैसवालों का पंछी सताता बहुत है।।2।।कभी कौम के नाम का फ़तवा पढ़ताकभी तो अवध के लिए ईंट गढ़तान मीरा को पूछे न कबिरा को जानेन रैदास…See More
Mar 28
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted photos
Feb 24
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण सर, सादर अभिवादन सहित आभार"
Jan 16
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल
"आ. भाई पंकज जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई । "
Jan 16
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल
"क्षमा निवेदन के साथ.......बहुत दिनों बाद ओबीओ पर हूँ, नए लोगों को ध्यान में रखलन के कारण गलती हुई। क्षमा करें"
Jan 16
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल
"//आदरणीय समर कबीर बाउजी// आप मेरा नाम नहीं लेना चाहते थे,तभी तो 'बाउजी' कहना शुरू'अ किया था, आज नाम के साथ बाउजी देख कर आश्चर्य चकित हूँ । 'फिर खुला याद के कमरे का ज्यूँ रौज़न कोई' 'ज़ह्न" शब्द की मात्रा 21होती…"
Jan 15
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल
"आदरणीय समर कबीर बाउजी...प्रणाम मत्ले के उला मिसरे में मैं ज़हन शब्द याद शब्द की जगह रखना चाहता हूँ, लेकिन मात्रा को लेकर सन्देह में हूँ सो याद शब्द 2 बार इस्तेमाल हुआ है। आखिरी शेर के लिए आपका सुझाव बहुत उचित है। सादर"
Jan 15
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । 'फिर खुला याद के कमरे का ज्यूँ रौज़न कोई त्यों ही फिर दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई' मतले के दोनों मिसरों में 'याद' शब्द खटकता है, इसे दुरुस्त करने का प्रयास…"
Jan 15
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल

2122 1122 1122 22फिर खुला याद के कमरे का ज्यूँ रौज़न कोईत्यों ही फिर दौड़ पड़ा याद का तौसन कोईशेर में ज़िक्र है कोचिंग व घने कुहरे काचाहता हूँ किसी रिक्शे पे चले मन कोईमैंने कुछ शेर केमिस्ट्री के कहे हैं, जिससेमेरे महबूब के दिल में हो रिएक्शन कोईकिस तरह मैंने सजाया है मेरे दिलबर कोआके देखे मेरी ग़ज़लों का ये गुलशन कोईशायरी गीत सभी कुछ जो लिखा है मैंनेजान तेरा है असर मेरा नहीं फ़न कोईमौलिक अप्रकाशितSee More
Jan 14
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय लक्ष्मण सर वाह एक सुंदर ग़ज़ल हुआ है। बहुत बधाई"
Sep 25, 2020
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-123
"आदरणीय अमीरुद्दीन जी बेहतरीन ग़ज़ल से मुशायरे का आग़ाज़ करने के लिए बहुत बधाई। "
Sep 25, 2020
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"आदरणीय बागी सर.........रचना को ओबीओ के सौहार्द के निमित्त मंच से हटा कर आपने बहुत उत्तम कार्य किया है। चूँकि भावनाएँ ही हैं जो हमें एक दूसरे से जोड़ती हैं...अतः आपका यह निर्णय स्वागत योग्य है। हाँ एक बात है कि मैंने एक मुक्तक, इस प्रकरण का ज्ञान…"
Feb 7, 2020
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"आदरणीय नवीन सर, सहिष्णुता ही अपेक्षित है......सादर"
Feb 4, 2020
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"आदरणीय नवीन त्रिपाठी जी 1. आप यह सुझाव देने को स्वतंत्र हैं कि ओबीओ मंच पर साम्प्रदायिक प्रहार करने वाली रचना न भेजी जाए, किन्तु 2. क्या भेजी जाए इसका सुझाव अनुचित है, क्योंकि 3. यह रचनाकार की निजी स्वतंत्रता का हनन है, यह उसकी मर्जी वह किन…"
Feb 4, 2020
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : आजादी (गणेश बाग़ी)
"इस रचना पर श्रेष्ठजनों के विचारों के बीच उपस्थित हूँ... 1. ओबीओ मंच की अपनी परम्परा सबसे महत्वपूर्ण है 2. हमें अपने बच्चों को सुधारना चाहिए......न कि पड़ोसी के बच्चे को.....बेहतर यह होता है कि हम अपनी कमियों की ओर ध्यान दें.......पर धर्म की कमियों…"
Feb 3, 2020
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 2 ईंटें पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगासुन; तेरे शीशे के घर पर सब बरसाऊँगाफूँक-फाँक कर वर्ग विभाजन वाला हर अध्यायक्या है सनातन सब को यह अहसास कराऊँगाजान रहा, जग की रानी है मुद्रा-माया धारीकिन्तु मनुज से प्रीत ज़रूरी रोज़ सिखाऊँगामठ अधिपति को पूज रहे, जबकि नहीं हो निर्बलवायु-अनल से युक्त बली हो, याद धराऊँगातीव्र प्रज्ज्वलित शब्द हैं मेरे ताप भयंकर हैकिंतु स्वर्ण-मन-शोधन को मैं यूँ ही जलाऊँगामौलिक अप्रकाशित See More
Jan 23, 2020

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

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दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई----ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

फिर खुला याद के कमरे का ज्यूँ रौज़न कोई

त्यों ही फिर दौड़ पड़ा याद का तौसन कोई

शेर में ज़िक्र है कोचिंग व घने कुहरे का

चाहता हूँ किसी रिक्शे पे चले मन कोई

मैंने कुछ शेर केमिस्ट्री के कहे हैं, जिससे

मेरे महबूब के दिल में हो रिएक्शन कोई

किस तरह मैंने सजाया है मेरे दिलबर को

आके देखे मेरी ग़ज़लों का ये गुलशन कोई

शायरी गीत सभी कुछ जो लिखा है मैंने

जान तेरा है असर मेरा नहीं फ़न…

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Posted on January 14, 2021 at 2:08pm — 6 Comments

ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 2 

ईंटें पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा

सुन; तेरे शीशे के घर पर सब बरसाऊँगा

फूँक-फाँक कर वर्ग विभाजन वाला हर अध्याय

क्या है सनातन सब को यह अहसास कराऊँगा

जान रहा, जग की रानी है मुद्रा-माया धारी

किन्तु मनुज से प्रीत ज़रूरी रोज़ सिखाऊँगा

मठ अधिपति को पूज रहे, जबकि नहीं हो निर्बल

वायु-अनल से युक्त बली हो, याद धराऊँगा

तीव्र प्रज्ज्वलित शब्द हैं मेरे ताप भयंकर है

किंतु स्वर्ण-मन-शोधन को मैं…

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Posted on September 9, 2019 at 11:00am — 2 Comments

आईना टूट न जाए मग़र ये ध्यान रहे----------ग़ज़ल

2122 1122 1212 112

तुम हसीं हो ये भले ही तुम्हें गुमान रहे

आईना टूट न जाए मग़र ये ध्यान रहे

पाँव मन्ज़िल की तरफ रख सँभल सँभल के ज़रा

एक दिल भी है तेरी राह में ये ध्यान रहे

तू ज़माने से रहे बे-ख़बर नहीं कहता

किन्तु इस दिल के भजन पर भी तेरा कान रहे

तेरी साँसों के हर-इक गीत में रहूँ शामिल

ताल सुर नाद ये पंकज ही तेरी तान रहे

पूछ मत नींद सुकूँ का हिसाब आशिक़ से

आशिक़ी कैसी अगर ध्यान में ज़ियान…

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Posted on August 29, 2019 at 9:30am — 2 Comments

तुम मेरे ख़ाबों के गुलशन में मिलो------ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

तुम मेरे ख़ाबों के गुलशन में रहो हक़ है तुम्हें

मुझ से जब चाहो ख़यालों में मिलो हक़ है तुम्हें

तुम को तकने की ख़ता, नींदें गँवाने की सज़ा

बदला आँखों से मेरी ऐसे ही लो हक़ है तुम्हें

बस तुम्हारा नाम हर पल जप रहा है मेरा दिल

मेरे सीने से लगो तुम भी सुनो हक़ है तुम्हें

कल्पना के व्योम में जितना मेरा विस्तार है

वह क्षितिज पूरा तुम्हारा, तुम उड़ो हक़ है तुम्हें

शब्द सारे भाव हर लय ताल…

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Posted on August 6, 2019 at 10:45am — 8 Comments

Comment Wall (7 comments)

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At 10:57am on August 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया
At 1:01am on August 7, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें
At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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