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रुख़ से जो मेरे यार ने पर्दा हटा दिया  - सलीम रज़ा

221 2121 1 221 212  

रुख़ से जो मेरे यार ने पर्दा हटा दिया   

महफ़िल में हुस्न वालों को पागल बना दिया

उसकी  हर एक अदा पे तो क़ुर्बान जाइए        

मौसम को जिसने छू के नशीला बना दिया

 

आई बाहर झूम के ख़ुश्बू बिखेरती 

ज़ुल्फें उड़ा के सबको दीवाना बना दिया 

 

जो  ज़ख्म  खाके भी रहा है आपका सदा

उस दिल पे फिर से आपने खंज़र चला दिया

 

देखा जो उसने प्यार से बस इक नज़र 'रज़ा' 

दिल में हमारे प्यार का गुलशन खिला दिया

------------------

 "मौलिक व अप्रकाशित

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