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ग़ज़ल- आरजू ही नहीं जब हुई मुख़्तसर

212 212 212 212
कीजिये मत अभी रोशनी मुख़्तसर ।
आदमी कर न ले जिंदगी मुख़्तसर ।।

इश्क़ में आपको ठोकरें क्या लगीं ।
दफ़अतन हो गयी बेख़ुदी मुख़्तसर ।।

नौजवां भूख से टूटता सा मिला ।
देखिए हो गयी आशिक़ी मुख़्तसर ।।

गलतियां बारहा कर वो कहने लगे ।
क्यूँ हुई मुल्क़ में नौकरी मुख़्तसर ।।

कैसे कह दूं के समझेंगे जज़्बात को ।
जब वो करते नहीं बात ही मुख़्तसर ।।

सिर्फ शिक़वे गिले में सहर हो गयी ।
वस्ल की रात होती गयी मुख़्तसर ।।

जब रकीबों से उसने मुलाकात की ।
आग दिल मे कहीं तो लगी मुख़्तसर ।।

कैसे मिलता सुकूँ आखिरी वक्त में ।
आरजू ही नहीं जब हुई मुख़्तसर ।।

याद आये बहुत मुझको लम्हात वो ।
आप से इक नज़र जो मिली मुख़्तसर ।।

है करम बादलों का चले आइए ।
बाम पर हो गयी चाँदनी मुख़्तसर ।।

आज भौरों को किसने ख़बर भेज दी ।
इक कली बाग में जब खिली मुख़्तसर ।।

शब्दार्थ - मुख़्तसर - संक्षिप्त , थोड़ा , कम, अल्प,
दफ़अतन- अचानक
बाम - छत

-डॉ नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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