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एकाकीपन

भटकती भीड़ है बाहर

भीतर  पसर  रहा

कपूर-सा उड़ता

आँसू-विहीन

अटूट अकेलापन

सांकल लगे बंद कमरे का

निर्जीव सुन्न एकान्त

निष्फल  प्रणय

चिलचिला रहा अन्तर में

दावाग्निमय   शोर

अंशुमान नहीं

यह है अन्धकारवृत

आग का गोला

बिछोह के अंतरिक्ष से आ रहा

यह अंतरित अकेलापन

यह कैसी अलविदा करी

कैसी थी यह समय की धार

दे दिया क्यूँ मेरी मीठी हँसी को

अतृप्त रिक्त क्षणों का भार

कैसी प्रीत थी यह, कैसा प्यार ?

मेरे प्यार, चले गए हो तुम

दर्द भरे मन को, सच

होता नहीं विश्वास

        ------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित रचना)

( कैसी प्रीत? कैसा प्यार? ... यह शब्द डा० धर्मवीर भारती जी की "आद्यन्त" में हैं))

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Comment by vijay nikore on April 19, 2018 at 3:53pm

सराहना के लिए हृदयतल से आभार, आदरणीया नीलम जी।

Comment by vijay nikore on April 19, 2018 at 3:52pm

सराहना के लिए हृदयतल से आभार, आदरणीय सुशील जी।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 19, 2018 at 1:02pm

आदरणीय विजय निकोर जी, बहुत ही भावपूर्ण रचना। प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on April 19, 2018 at 12:29pm

भटकती भीड़ है बाहर

भीतर पसर रहा

कपूर-सा उड़ता

आँसू-विहीन

अटूट अकेलापन

अप्रतिम अप्रतिम अप्रतिम सृजन सर .... अंतर्मन के दावानल को आपने बड़ी ही ख़ूबसूरती से शब्दों में उकेरा है। हार्दिक बधाई सर।

Comment by vijay nikore on April 13, 2018 at 6:59am

सराहना के लिए हृदयतल से आभार, आदरणीय भाई समर जी।

Comment by vijay nikore on April 13, 2018 at 6:59am

सराहना के लिए हृदयतल से आभार, आदरणीय श्याम जी

Comment by vijay nikore on April 13, 2018 at 6:52am

सराहना के लिए हृदयतल से आभार, आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी

Comment by vijay nikore on April 13, 2018 at 6:51am

सराहना के लिए हृदयतल से आभार, आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी।

Comment by Samar kabeer on April 12, 2018 at 6:16pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत ही उम्दा और प्रभावशाली सृजन, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 12, 2018 at 10:45am
बहुत सुन्दर ... सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय

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