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कभी रौशनी से टकराकर
बोल निशा तेरी चौखट पर
दीप जला क्या ?

प्रश्न पूछतीं तेरी भूरी-भूरी आँखे भोली-भाली,
क्या उत्तर दूँ क्या समझेगी
किसने घोली तेरे हर दिन में उगने से पहले ही
इन रातों जैसी स्याही काली...

सिर्फ़ ज़रूरी बात यही है-
तेरी पलकों में जुगनू बन
स्वप्न पला क्या ?

जटा-जटा बन छितर-बितर ये बाल धूल से मैले-मैले
नन्हे हाथों से पीछे कर
बीन-बान कर दीप, माँग कर इधर-उधर से थोड़ी उतरन
भर लाई घर कितने थैले...

मुट्ठी में भींची दौलत से
होठों पर मुस्कान सजाकर
दर्द टला क्या ?

भूखे दिन भूखी रातों ने कब माँगी है दूध-मिठाई
धुआँ-धुआँ पकती खिचड़ी ने
काली कर दीं छत दीवारें और खाँसती खटिया भी
तिस पर माँगे हर वक़्त दवाई...

"आँखें मूँद जिये जाना" अब
तुझे सिखा दी जीवन ने भी
यही कला क्या ?

देख पटाखों की पट-पट और झिलमिल-झिलमिल जलती लड़ियाँ
मन तेरा तो मचला होगा
पर माँगी क्या तूने मालिक से छू लेने भर को ही बस
थोड़ी सी झिलमिल फुलझड़ियाँ...

फिर अन्धेरी दीवाली पर
तू भीतर-भीतर चिल्लाई
रूँध गला क्या ?

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Dr.Prachi Singh on May 16, 2018 at 5:43pm

"आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी 

इस गीत की मात्रा 8x8 और 8x8x8 के खण्डों में है.. आप पूरे वाक्यों की मात्रा देखिये पूर्ण विराम आने तक , सिर्फ अल्पविराम तक नहीं...
आपको मात्रा 8  या 16 या 24 मिलेगी एक  निश्चित आवृति में ..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 19, 2018 at 3:45pm

इन रातों जैसी स्याही काली....................
2    2 2  2 2   2 2   2 2 ...............................18
सिर्फ़ ज़रूरी बात यही है-
तेरी पलकों में जुगनू बन
स्वप्न पला क्या ?

जटा-जटा बन छितर-बितर ये बाल धूल से मैले-मैले
नन्हे हाथों से पीछे कर
बीन-बान कर दीप, माँग कर इधर-उधर से थोड़ी उतरन
भर लाई घर कितने थैले...

2   2 2    2  22    22 ........................16  आदरणीया प्राची जी यहाँ मात्राओं के बारे में अस्मंजस में हूँ ....कृपया मार्गदर्शन करने का कष्ट करें सादर 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 22, 2017 at 8:54pm

झाड़खंड में एक बालिका मर गयी कहते भात भात
कहीं कोई सिसकी ठहरी न
लीपा पोती करने में सब और भला करते ही क्या?

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 22, 2017 at 10:50am

दीन-हीन की रात अँधेरी,  पूछ रहे हम, दीप जला क्या ? स्वप्न पला क्या ? बहुत मार्मिक और सार्थक गीत रचना के लिए हार्दिक बधाई बहन डॉ. प्राची जी | दीपोत्सव पर्व की हार्दिक बधाई !

Comment by Mahendra Kumar on October 22, 2017 at 10:27am

आ. प्राची जी, दिवाली पर मैं ऐसी ही रचना की तलाश कर रहा था. इस शानदार प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by indravidyavachaspatitiwari on October 20, 2017 at 7:27pm

दीपावली के त्योहार पर एक प्लास्टिक बीनने वाली लड़की केा माध्यम बनाकर उस गरीब वर्ग का दर्द उकेरने के लिए हार्दिक बधाई। बहुत हृदयग्राही रचना बनी है।

Comment by SALIM RAZA REWA on October 20, 2017 at 3:24pm
आ. प्राची जी.
ख़ूबसूरत रचना के लिए बधाई.
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2017 at 3:49pm
प्रश्नवाचक पंक्तियों में मार्मिक भाव पिरोते हुए वर्ग विशेष के जीवन और पर्वों के समय का सच्चा चित्रण करती विचारोत्तेजक रचना के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीया डॉ. प्राची जी। दीपोत्सव पर काश हम ऐसे सवालों का सही जवाब समाधान रूप में देने का प्रण करें। दीपोत्सव पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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