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लघुकथा - पर्यावरण-प्रेमी

"बधाई हो मिश्रा जी , हार्दिक बधाई आपको । कल के सारे अखबारों में आपकी न्यूज़ थी । सभी अखबारों ने बड़ी प्रमुखता से आपके "एण्टी-पॉलिथीन कैम्पेन " के बारे में छापा है । बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप पर्यावरण के लिए । वाकई पॉलिथीन बहुत खतरनाक है । इससे कई गायें भी काल के गाल में समा रही है ।"
" जी, गुप्ता जी ! मेरा मिशन है पॉलिथीन मुक्त पर्यावरण । चाहता हूँ सरकार इस पर पूरी तरह से बैन लगा दें । बस ! इसी में लगा हूँ । "
" देश को आप जैसे पर्यावरण बचाव योद्धाओं की ज़रूरत है ।"
" गुप्ता जी आपने बहुत बड़ी बात कह दी । मैं तो अदना-सा कार्यकर्ता हूँ ।" अभी इन दोनों का वार्तालाप चल ही रहा था कि दुकानदार बोला-"लीजिए , मिश्रा जी आपका सारा सामान ।" मिश्रा जी ने अपने नियमित दुकानदार के हाथों सामान लिया , गुप्ता जी से अनुमति चाही । दुकान की सीढ़ियाँ उतर ही रहे थे कि इतने में मिश्रा जी का चिंटू जो कि उनके साथ था बोला-" पापा , दुकानदार भय्या ने तो हमारा सारा सामान पॉलिथीन में पैक करके दिया है ।"
" चुप रे ! !" मिश्रा जी ने चिंटू को डाँटते हुए कहा ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on October 5, 2017 at 7:51am
आपकी टिप्पणी पाकर मेरा लेखन सार्थक हो गया आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी ।
Comment by Mohammed Arif on October 5, 2017 at 7:50am
आदरणीय शेखक्षशहज़ाद उस्मानी जी आदाब, आपकी सटीक-सारगर्भित और बकमाल समीक्षा पढ़कर धन्य हो गया । वाक ई आप जैसे निष्णात समीक्षक और ख़ासतौर से लघुकथा समीक्षक ओबीओ की शान है । हमें आप जैसे समीक्षक से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । हार्दिक आभार आपका ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 5, 2017 at 6:28am
बहुत बढ़िया कटाक्ष/व्यंग्य। यहां पर तीन बातें उभर कर आती हैं :
१- व्यक्ति की कथनी और करनी सामान्य प्रवृत्ति के तौर पर। भाषण कुछ और कर्म कुछ, दिखाने के कर्म कुछ और दैनिक जीवन में यथार्थ में उसके विपरीत या उसकी उपेक्षा वाले कर्म या लापरवाही।
२- समाज सेवा या पर्यावरण संरक्षण सेवा में संलग्न लोग ऐसे हालात में फंसते हैं या जूझते हैं जहां पर्यावरण/समाज के विरुद्ध छोटी/बड़ी गतिविधियों में वे जाने-अनजाने लिप्त हो जाते हैं या ऐसे समझौते कर जाते हैैं या विवश कर दिये जाते हैैं। लेकिन लोग इसे भी 'कथनी और करनी' कह देते हैं। व्यवस्था या सिस्टम को दोषी नहीं मानते या मानते हुए हार स्वीकार कर लेते हैं, आवाज़ नहीं उठाते उनके खिलाफ।
३- बच्चे सब देख और समझ रहे हैं कि पढ़ाया/सिखाया/दिखाया/सुनाया क्या जाता है और व्यवस्था/सिस्टम/व्यवहार में क्या चल रहा है। आज के बच्चे इसी कारण भ्रमित/उलझे या पथभ्रष्ट भी हैं।
अंत में 'चुप रे!' सब कुछ बयान कर रहा है। इसके पहले मिश्रा जी की लापरवाही स्पष्ट हुई है; दुकान पर ही सजग पर्यावरण-प्रेमी ने पोलीथिन नोटिस कर आपत्ति क्यों नहीं जताई? लेखक ने समाज/सिस्टम/व्यवहार में खामियां उभारी हैं।
बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब। शीर्षक तो और भी बेहतर हो ही सकते हैं। यह शीर्षक पहले से ही विषय वस्तु लक्ष्य स्पष्ट कर देता है।
Comment by नाथ सोनांचली on October 5, 2017 at 5:11am
आद0 आरिफ भाई जी सादर अभिवादन। समाज मे बहुत से ऐसे लोग है, जो करते कुछ और है और बोलते उसके विपरीत। आपने बढ़िया कथानक के साथ उम्दा लघुकथा कही। मुबारकबाद आपको
Comment by Mohammed Arif on October 4, 2017 at 9:23pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी ।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 4, 2017 at 8:05pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी।बच्चे मन के सच्चे। बेहतरीन लघुकथा।

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