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एक पति की आत्मस्वीक्रति

  चुन्नों, मेरा चश्मा कंहा रखा है ? चुन्नो मेरी नयी वाली कमीज नहीं मिल रही है, चुन्नो तुमने मेरा रुमाल देखा है क्या? चुन्नो एक कप चाय मिलेगी क्या? चुन्नो चुन्नो चुन्नो सच घर आते ही चुन्नो चुन्नो के नाम की माला जपने लगता हूं। सच आफिस मे रहता हूं तो आफिस की छोटी छोटी बातें नही भूलती पर घर आते ही जैसे यादें हैं कि साथ छोड के फिर से आफिस मे ही दुपुक जाती हैं ये कह के कि जाओ अब अपनी चुन्नो के साथ ही रहो मेरी क्या जरुरत है वो जो है न तुम्हारी और तुम्हारे घर की हर छोटी बडी चीजें याद रखने के लिये। और सच चुन्नो सिर्फ यादें ही क्यूं घर आते ही न जाने क्यूं निर्णय लेनी की क्षमता को भी जैसे ग्रहण लग जाता है। छोटी छोटी बातों के लिये भी तुम्हारी सलाह के बिना काम नही कर पाता चाहे वह सब्जी लाने का हो तो पूछना पडता है बाजार जा रहा हूं क्या सब्जी लाउं? शाम की पार्टी मे कौन सी ड्रेस पहनूं। इस दिवाली पे दीवारों पे कौन सा रंग करवाऊँ या कि दोस्त की सालगिरह पे क्या गिफ़्ट देना है, बेटे को इस सर्दी पे सूट बनवाया जाये कि ब्लेजर ही दिलवाया जाये, सच ये सब भी बिना तुमसे पूछे निर्णय नही ले पाता। भले ही तुम डिझकती रहो कि मैने हर बात का ठेका ले लिया है क्या कोई काम तुम अपने मन से नही कर सकते हो क्या। पर न जाने क्यूं तुम्हारी ये झिडकी और डांट भी अच्छी लगती है और मै तुम्हारा मनुहार करने लगता हूं और तुम भी तो हो न थोडी देर बाद बनावटी गुस्से से उठ कर चल देती हो चाय बनाने या किचन का काम करने यह कहते हुये कि ‘मुझसे बार बार क्या पूछते रहते हो जो तुम्हारी मर्जी हो वो करो। हर काम मुझसे पूछ के करते हो क्या ? जब तुमको अपनी उस आफिस वाली के बर्थ डे मे जाना होता है तब तो नही पूछते हो कि आज कौन सी कमीज पहनू या कौन सा गिफ़्ट ले जाऊँ तब तो खुद ही बाजार से खरीदते हुए फुदकते हुये ले आये थे तो आज भी वही कर लो।’ और फिर मै अपनी सफाई देते हुए तुम्हारे पीछे पीछे किचेन तक आ जाता हूं और तुम कहती हो ‘जाओ नाटक मत करो मै सब समझती हूं’ 
सच चुन्नो आज शादी के उन्नीस साल बाद भी बाथरुम मे टॉवेल ले जाने की आदत नही पडी और तुम्हे ही आवाज देना पडता है। जब किसी दिन तुम घर पे नही होती हो तो सच, तब कई बार तो बाथरुम से गीले ही निकलना पडता है।
जानती हो चुन्नो आज इतने सालों बाद मै समझा कि अपने हिन्दू रीत रिवाजो वाली शादी मे फेरों के वक्त वर वधू के उपर धान से वर्षा करके क्यूं आषिर्वाद लेते है। तो सूनो एक तो धान से आर्षिवाद देना का मतलब होता हो कि ‘हे, वर वधू तुम लोगों का जीवन धन धान्य से परिपूर्ण रहे और जैसे धान की भुस मे धान लिपटा होता है वैसे ही तुम वर वधू भी एक दूसरे के पूरक रहो साथ रहो। तो सच चुन्नो तुम धान हो और मै धान की भूसी हूं और षायद तभी तुम जो अक्सर मजाक मे कहती हो कि तुम्हारे दिमाग मे भूंसा भरा है तो सही ही कहती हो मेरी चुन्नो।
चुन्नो आज शादी के इतने दिनों बाद जब पीछे मुड मे देखता हूं। तो विश्वास नही होता साल के इन उन्नीस सालों मे हमने इतने सारे आंधी तूफान और आषा निराषा के ढेरों गहवर और र्पवत पार कर आयें हैं। 
आज जब जीवन की लगभग समतल भूमि पर चल कर लगता ही नही कि इतनी कठिन यात्रा किस तरह कट गयी।
मुकेश इलाहाबादी ---------------

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 561

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Comment by Mohammed Arif on September 19, 2017 at 9:30am
आदरणीय मुकेश श्रीवास्तव जी आदाब, सुंदर रचना के लिए बधाई ।
Comment by MUKESH SRIVASTAVA on September 18, 2017 at 4:47pm

rancha pasandgee ke liye aabhar adrneey SAMEER KABEER JEE, NILESH JEE , SALIM RAZAA JEE 

Comment by Samar kabeer on September 18, 2017 at 4:28pm
जनाब मुकेश जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 18, 2017 at 12:57pm

आत्मस्वीकृति सही होगा ..
सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on September 18, 2017 at 12:48pm
भाई मुकेश जी,
आपकी कहानी पड़कर दिल खुश हो गया, भाई मै भी इसी तरह अपनी चुन्नी पर डिपेंड हूँ.... मुबारक़बाद

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