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1-
कौन सुखी संसार में, जिसे न हो व्यवधान।
होती बुद्धि विवेक से, हर मुश्किल आसान।।
निरापद किसको देखा।।
2-
विपदा हो जब सामने, मुश्किल में हो जान।
ऐसे में हिम्मत रखें, सँग में प्रभु का ध्यान।।
आपदा टल जाएगी।।
3-
मुश्किल का मिलता नहीं, जब कोई भी तोड़।
अंदर ही अंदर वही, लेती रक्त निचोड़।।
आदमी घुटता रहता।।
4-
होती मुश्किल वक्त में, रिश्तों की पहचान।
सब दिन होते हैं नहीं, हरदम एक समान।।
परख सबकी हो जाती।।
5-
चुप रहकर ही काटिए, जब हो मुश्किल वक्त।
पलट दिए हैं वक्त ने, कितने ताजो तख्त।।
समय की करें प्रतीक्षा।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

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Comment by Hariom Shrivastava on August 8, 2017 at 4:55pm
आदरणीय Nilesh Se hain kar जी, जी एस टी कुण्डलिया पर त्रुटिवश ही मौलिक व अप्रकाशित नहीं लिखा था। आज मैंने आपकी टिप्पणी देखी तो संशोधन कर दिया है। त्रुटि हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ। किंतु ऐसी त्रुटि होने पर रचना को अप्रूव्ड ही नहीं करना चाहिए। कृपया अप्रकाशित का अर्थ और स्पष्ट कर दें,जिससे भविष्य में कोई गफलत न हो। वैसे भी यहाँ पोस्ट करना आसान नहीं है, अतः मैं कम ही पोस्ट करता हूँ। सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2017 at 9:03pm

आ० अनुज भंडारी जी हिन्दी में  यदि अनुस्वार चन्द्र  के साथ है तो वह  एक मात्रिक ही होता है आतः यहाँ  सँग की मात्रा 11  ही है जो सही है ------------ पर  ----ताजो तख्त  के प्रयोग से बचना चाहिए था .  तख्त और वक्त  का तुक भी सही नहीं है  तथाप इन दोहों के लिए धन्यवाद . दुमदार दोहों का चलन व्यंग को गति और उभार  देने के लिए हुआ था  पर यहाँ दोहे व्यंगात्मक नहीं हैं . सादर .

Comment by Samar kabeer on July 10, 2017 at 6:22pm
जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,बहुत ख़ूब वाह, अच्छा सन्देश दे रहे हैं आपके दुमदार दोहे,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 10, 2017 at 6:11pm

आदरनीय हरि ओम भाई , जीवन से जुड़े दुम दार होहों के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

आदरणीय -

संग = 21 लिया जना चाहिये ,,, सँग में प्रभु का ध्यान   ... की मात्रा 12 हो रहीं हैं

Comment by Mohammed Arif on July 10, 2017 at 8:04am
आदरणीय हरिओम जी आदाब,बेहतरीन दुमदार दोहों की प्रस्तुति । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on July 10, 2017 at 5:18am
आद0 हरिओम श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन, अच्छे दुमदार दोहे बन पड़े है। बधाई स्वीकारें।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 9, 2017 at 6:04pm
भाई हरिओम जी अति उत्तम दुमदार दोहे हुए है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

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