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कुछ फ़र्द मंच की नज़्र :

न सही तेरी नज़रों को मुहब्बत की तमन्ना मगर !
तेरी नज़रें , नज़रों की हमराज़ तो बन सकती थीं !!1!!

माना करीबी दिल को ख़ुशगवार लगती है !
मगर दूरी में भी कम दिलकशी नहीं होती !!2!!


जाने क्यूँ आ गयी शर्म घटाओं को आज !
शायद किसी ने रुख़ पे ज़ुल्फें बिखेर दीं !!3!!


क्यूँ अँधेरे भी उजले से लगने लगे !
शायद, प्यार रूठा लौट आया है !!4!!


आये न थे तो चश्म तर-बतर थी !
गए पलट के तो कयामत ढा गए !!5!!


सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on February 26, 2017 at 12:07pm

आदरणीय Mohammed Arif साहिब प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय सराहना का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Mohammed Arif on February 26, 2017 at 9:31am
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, बहुत शानदार अशआर । बधाई स्वीकार करें ।

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