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अतुकांत कविता : प्रतिनिधि (गणेश जी बागी)

मैं सड़क हूँ
मुझे तैयार किया गया है
रोड रोलरों से कुचल कर.


मुझे रोज रौंदते हैं 
लाखों वाहन
अक्सर....
विरोध प्रदर्शन का दंश
झेलती हूँ
अपने कलेजे पर
होता रहता हैं
पुतला दहन भी
मेरे ही सीने पर
विपरीत परिस्थितियों में
मैं ही बन जाती हूँ
आश्रय स्थल
कई कई बार तो
प्राकृतिक बुलावे का निपटान भी
हो जाता है
मेरी ही गोद में


फिर भी.....

मैं सहिष्णु हूँ
या
असहिष्णु !
यह तय करते हैं
कथित बुद्धिजीवी.


मैं सड़क हूँ
एक सच्ची प्रतिनधि
इस देश की.

(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट =>लघुकथा : शातिर

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Comment

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Comment by TEJ VEER SINGH on November 29, 2015 at 5:33pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी बागी जी!बहुत सारे विषयों पर एक साथ प्रहार और  कटाक्ष करती समसामयिक सशक्त रचना!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 29, 2015 at 2:50pm

कई कई बार तो
प्राकृतिक बुलावे का निपटान भी
हो जाता है
मेरी ही गोद में-------------------वाह सजीव चित्रण , बहुत बहुत बधाई आदरणीय ,

कृपया ध्यान दे...

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