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टेलीविज़न बड़े घमण्ड में ताव दे रहा था,"आज तो ज़माने पर हमारा कब्ज़ा है।हमारे बिना किसी का गुज़ारा नहीं।बच्चे बूढ़े या जवान,सब में अपनी पहचान"
अब रेडियो इतराई,"देर रात तक पढ़ने वालों ,दूर-दराज़ तक के लोगों और मजदूरी करने वालों का मैं करती हूँ मनोरंजन और बांटती हूँ ज्ञान,बहुत दूर तक मेरी भी पहचान।"
अब कंप्यूटर की बारी आई,उसने भी सब की खिल्ली उड़ाई,"क्या रेडियो -टीवी मुझमें सब चलता सब दिखता है।और मनोरंजन से लेकर ज्ञान तक सब मुझमें टिकता है।"
इनकी बातें सुनकर साहित्य मुस्कराया।
उसके मन पटल पर कुछ ख्याल आया,"तुम सब महान,सब ही बाँटों ज्ञान।लोगों को किताबों का भी रस पीने दो।मुझे उस हाल में भी जीने दो।"
मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 2, 2015 at 1:31pm
हार्दिक आभार आपका आदरणीय तेजवीर सिंह जी
Comment by TEJ VEER SINGH on November 28, 2015 at 7:45pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सतविंदर जी!बहुत सटीक प्रस्तुति!

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 28, 2015 at 10:36am
आभार आदरणीय शेख साहब।आप सही फ़रमा रहे हैं।मुझे भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है।ऐसे ही रचनाएँ हमें और संयमित होकर लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।आपका सुझाव सिर माथे।आगे प्रयास करूँगा अधिक समय देने का।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 28, 2015 at 9:58am
बहुत बढ़िया प्रस्तुति आदरणीय सतविंदर कुमार जी। थोड़ा और समय देकर उत्कृष्ट बना सकते थे।

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